वेद धर्म की परीक्षा
गोदावरी नदी के तट पर महर्षि अंगिरा का आश्रम था, जहाँ अनेक संत तपस्या करते थे। इनमें महर्षि पैल के पुत्र, वेद धर्म ऋषि भी थे, जिनके अनेक शिष्य थे। एक बार वेद धर्म ने अपने शिष्यों की परीक्षा लेने का विचार किया। उन्होंने सभी शिष्यों को एकत्र कर कहा, “मैंने प्रार्थनाओं के बल पर अपने अधिकांश पाप कर्मों का नाश कर लिया है, किंतु कुछ शेष रह गए हैं। केवल प्रार्थना से मुक्ति नहीं मिल सकती। अतः मैं काशी जाकर शेष दुखों को भोगकर इसी जन्म में मुक्त होना चाहता हूँ।”
उन्होंने आगे कहा, “मुझे एक कुष्ठरोगी के रूप में, बिना आँखों और पैरों के, २१ वर्ष तक कठिन दुख झेलने होंगे। क्या कोई ऐसा शिष्य है जो इन २१ वर्षों तक मेरी निःस्वार्थ सेवा करेगा?”
सभी शिष्य मौन रहे, केवल एक शिष्य दीपक आगे आया। उसने कहा, “गुरुदेव, मैं स्वयं आपके स्थान पर २१ वर्षों तक वह दुख भोगने को तैयार हूँ।” वेद धर्म ने प्रसन्न होकर कहा, “प्रत्येक को अपने कर्मों का फल स्वयं भोगना होता है। तुम मेरे दुख नहीं भोग सकते। परंतु एक रोगी की सेवा करना, स्वयं रोगी होने से कहीं अधिक कठिन है। क्या तुम यह कर सकोगे?” दीपक ने तत्काल स्वीकार कर लिया।
दोनों काशी पहुँचे। वेद धर्म ने गंगा स्नान कर विश्वनाथ की आराधना की और तत्काल वे एक अंधे, अपंग कुष्ठरोगी में बदल गए। दीपक ने उनके रहने के लिए एक कुटिया बनाई। रोग के कारण गुरु का शरीर दुर्गंधयुक्त हो गया। धीरे-धीरे उनका मानसिक संतुलन भी बिगड़ने लगा और वे दीपक के प्रति कठोर व रूखे हो गए।
किंतु दीपक का सेवाभाव दिनोंदिन बढ़ता गया। उसने गुरु के घाव साफ़ किए, उनकी समुचित देखभाल की। उसने कभी मंदिर में प्रवेश न किया था, फिर भी वह वेद धर्म को स्वयं काशी विश्वनाथ का रूप मानकर सेवा करता रहा। वह प्रतिदिन गुरु के लिए भोजन लाता, और चाहे गुरु उस भोजन को अधिक, कम या बेस्वाद कहकर भला-बुरा क्यों न कहते, दीपक कभी नाराज़ नहीं हुआ।
एक दिन स्वयं काशी विश्वनाथ दीपक के सामने प्रकट हुए और उसे वरदान माँगने को कहा। दीपक ने विनम्रतापूर्वक कहा, “हे प्रभु, बिना गुरु की आज्ञा के मैं कुछ नहीं माँग सकता।” उसने जाकर गुरु को सब कुछ बताया। वेद धर्म ने उसका उपहास उड़ाते हुए कहा, “तुम तो सेवा से छुटकारा पाने का वरदान माँगने जा रहे थे! मैं कुछ नहीं माँगता; मैं तो इसी जन्म में अपने कष्टों का अंत चाहता हूँ।”
दीपक ने यह बात विश्वनाथ को बताई। कुछ ही क्षणों में भगवान विष्णु प्रकट हुए और दीपक के साथ वेद धर्म की कुटिया में पहुँचे। विष्णु ने दीपक से कहा, “तुम्हारी गुरुभक्ति अद्भुत है। मैं तुम्हें तुम्हारी इच्छा का वरदान देने के लिए बाध्य हूँ।”
दीपक ने कोई स्वार्थपूर्ण वर न माँगकर केवल इतना कहा, “प्रभु, मुझे अपने गुरु की सेवा करने की और अधिक सहनशक्ति प्रदान करें।” दीपक की नि:स्वार्थ भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने वरदान देते हुए घोषणा की, “जो शिष्य इस प्रकार गुरु की सेवा करते हैं, उन्हें त्रिदेव—ब्रह्मा, विष्णु और महेश—का आशीर्वाद सदैव प्राप्त होगा।”
तभी वेद धर्म का कुष्ठरोगी रूप तत्काल लुप्त हो गया और वे पूर्णतः स्वस्थ हो गए। उन्होंने दीपक को अष्ट सिद्धियाँ और नौ निधियों का वरदान दिया। फिर उन्होंने स्पष्ट किया, “हे दीपक, मैंने केवल तुम्हारी परीक्षा लेने और संसार को गुरु-शिष्य के पवित्र संबंध का संदेश देने के लिए यह रूप धारण किया था। मैं यह दिखाना चाहता था कि जीवन के कठिन समय में धैर्य और सेवाभाव से ही सच्ची मुक्ति मिलती है।
शिक्षा: कर्मफल को भोगना प्रत्येक का अपना दायित्व है, पर सेवा का पुण्य अतुलनीय है।