आसमान छूने की चाहत

आसमान छूने की चाहत

सोने से पहले की कहानियाँ

हवा का तेज़ झोंका आया। पोस्टमैन मुश्किल से शर्मा जी के घर के दरवाज़े तक पहुँचा। जब दरवाज़ा खुला, तो श्रीमती शर्मा ने “नमस्ते भैया” कहा, लेकिन “धन्यवाद” कहने से पहले ही हवा ने पोस्टमैन के हाथ से चिट्ठियाँ छीन लीं और वे घर के अंदर उड़ गईं। दरवाज़ा ज़ोर से भड़ाम हो गया। श्रीमती शर्मा चिट्ठियाँ बटोरने दौड़ीं। “हे राम,” उन्होंने कहा। आठ साल का रोहन खिड़की से बाहर देख रहा था – पीपल के पत्ते हवा में नाच रहे थे। “मम्मी,” उसने कहा, “क्या मैं बाहर खेल सकता हूँ?” “संभल के बेटा,” उन्होंने कहा। “आज बहुत तूफ़ान है।” रोहन खिड़की की जगह से कूदा और दरवाज़े की तरफ़ भागा। उसने ज़ोर से धक्का देकर दरवाज़ा खोला। हवा ने झटका दिया और श्रीमती शर्मा के हाथ से नई इकट्ठी की गई चिट्ठियाँ फिर से उड़ा दीं। “अरे बाप रे,” उन्होंने दोबारा कहा। रोहन बाहर भागा और दरवाज़ा ज़ोर से बंद हो गया। बाहर, पीले, सुनहरे और लाल पत्ते पेड़ों से उछल रहे थे, छतों पर गिर रहे थे, फिर से उड़ रहे थे, और एक-दूसरे का पीछा करते हुए गली में नाच रहे थे। रोहन मंत्रमुग्ध होकर देखने लगा। “काश मैं भी एक पत्ता होता, तो पूरी दुनिया घूम लेता,” रोहन ने सोचा और फिर रंगों के बवंडर में कूद गया। श्रीमती शर्मा बरामदे में आईं। “रोहन, तुम्हारा स्वेटर लो। पहन लो बेटा।” लेकिन सामने के आँगन में कोई रोहन नहीं था। “रोहन?” रोहन अब एक पत्ता बन चुका था। वह बाकी पत्तों के साथ गली में उड़ रहा था। एक चमकदार लाल पीपल का पत्ता उसके पास आया, उसे छुआ और आगे निकल गया। रोहन ने उसे पकड़ा, उससे टकराया, और आगे निकल गया। वे गोल-गोल घूमे, कारों और खंभों से टकराए, आसमान में उड़े और फिर नीचे गिरे। “कितना मज़ा आ रहा है,” रोहन ने सोचा। वह लाल पत्ता उसके सामने उड़ा। सूरज की रोशनी उसमें से छन रही थी, जिससे वह चमक रहा था। “तुम्हें लगता है हम कहाँ जा रहे हैं?” रोहन ने पत्ते से पूछा। “क्या फ़र्क़ पड़ता है?” पत्ते ने जवाब दिया। “बस मज़े करो यार। ज़िंदगी छोटी है।” “मैं इससे सहमत नहीं हूँ,” एक बूढ़े पत्ते ने अचानक उनके पास आकर कहा। “सफ़र छोटा हो सकता है, लेकिन अंत ही नई शुरुआत है।” रोहन ने इस बात पर सोचा, जितना एक पत्ता सोच सकता है। “हमारा अंत कहाँ होगा?” “अगर हवा तुम्हें उस दिशा में ले जाए,” बूढ़े पत्ते ने कहा, “तो तुम कचरे के ढेर में पहुँचोगे।” “मुझे वहाँ नहीं जाना,” रोहन ने कहा। “और अगर हवा तुम्हें उस दिशा में ले जाए, तो तुम ऊँचे आसमान में उड़ोगे और वो चीज़ें देखोगे जो किसी पत्ते ने कभी नहीं देखीं।” “मेरे साथ कचरे के ढेर में चलो,” लाल पत्ते ने कहा। “मेरे सब दोस्त वहीं हैं।” हवा ने रोहन और लाल पत्ते को उड़ाया। रोहन ने अपने विकल्पों के बारे में सोचा। वह खेलना जारी रखना चाहता था। “ठीक है,” रोहन ने कहा, “मैं तुम्हारे साथ चलता हूँ।” हवा की दिशा बदली और रोहन और पत्ता कचरे के ढेर की तरफ़ उड़ने लगे। बूढ़ा पत्ता साथ नहीं आया। वह आगे उड़ा और अचानक ऊँचे आसमान में चला गया। “अरे वाह,” उसने पुकारा, “यहाँ से नज़ारा देखो। कमाल का है। आओ भी यार।” रोहन और लाल पत्ते ने उसे अनसुना कर दिया। “मुझे कुछ दिख रहा है। मुझे कचरे का ढेर दिख रहा है,” बूढ़े पत्ते ने चिल्लाकर कहा। “मुझे धुआँ दिख रहा है। ऊपर आओ। मुझे आग दिख रही है।” “मुझे कुछ नहीं दिख रहा,” लाल पत्ते ने कहा। रोहन ने कचरे के ढेर के चारों ओर की बाड़ देखी। वह अपने दोस्त के साथ था, इसलिए खुश था। वे ढेर में मज़े करेंगे। अचानक, एक कार रुकी। यह रोहन की मम्मी थीं। श्रीमती शर्मा अपने बेटे को कचरे के ढेर में जाने नहीं देना चाहती थीं। “रुको,” उन्होंने कार से उतरते हुए कहा। “तुम्हें वहाँ खेलने की इजाज़त नहीं है। तुम्हें धुआँ नहीं दिख रहा क्या?” रोहन ने लाल पत्ते को दीवार से टकराते देखा। वह उसे पकड़ने दौड़ा लेकिन पहुँच नहीं पाया। श्रीमती शर्मा ने आकर पत्ता उठाया। उन्होंने उसे अपनी जेब में रख लिया। “यहाँ,” उन्होंने कहा, “घर पहुँचने तक सुरक्षित रहेगा।” रोहन मुस्कुराया, कार की तरफ़ भागा और अंदर बैठ गया। उसने पीछे की खिड़की का शीशा नीचे किया और आसमान की तरफ़ देखा। उसने सोचा कि बूढ़ा पत्ता कहाँ गया होगा। शायद एक दिन वह भी वो देख पाए जो बूढ़े पत्ते ने देखा था – शायद।

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