एक बार की बात है, एक प्यासी चींटी नदी से पानी पी रही थी। अचानक वह संतुलन खो बैठी और नदी के पानी में गिर गई। चींटी जोर-जोर से चिल्लाने लगी, “बचाओ! बचाओ!” परंतु उसकी पुकार कोई नहीं सुन पाया। पास ही एक पेड़ पर बैठी एक कबूतर ने चींटी को संकट में देखा। उसने तुरंत पेड़ से एक पत्ता तोड़ा और पानी में गिरती चींटी के पास गिरा दिया। चींटी उस पत्ते पर चढ़ गई और उसने अपनी जान बचाने के लिए कबूतर को धन्यवाद दिया।
कुछ दिनों बाद वही कबूतर पेड़ पर बैठी थी। तभी चींटी ने देखा कि एक शिकारी ने कबूतर पर निशाना साध रखा है। चींटी ने पहचान लिया कि उसकी मित्र कबूतर संकट में है। उसने तुरंत शिकारी के पैर में जोर से काट लिया। शिकारी दर्द से चिल्ला उठा और उसका तीर कबूतर से चूक गया। इस प्रकार चींटी ने कबूतर की जान बचा ली। कबूतर ने चींटी का आभार व्यक्त किया और वे दोनों आजीवन मित्र बन गए।
इस कहानी की सीख है कि एक अच्छा कार्य दूसरे अच्छे कार्य को जन्म देता है।