भरवि, दंभहीन कवि
एक बार की बात है, एक महान कवि भरवि रहते थे। वे अत्यंत विद्वान, वेद-पुराणों के ज्ञाता और काव्य में निपुण थे। उनकी प्रशंसा राजा करते, सहचर विद्वान करते, माता करतीं और पत्नी भी करती थीं। किंतु, उनके स्वयं के पिता ने उन्हें कभी एक बार भी प्रशंसा के दो शब्द नहीं दिए।
एक बार राज्य में एक समारोह हुआ जहाँ भरवि को श्रेष्ठ कवि के रूप में सम्मानित किया गया। इस समारोह के बाद भी, पिता ने प्रशंसा करना तो दूर, उन पर ध्यान तक नहीं दिया। भरवि को यह बात अत्यंत कष्टदायक लगी। वे अक्सर माता से कहते कि वे पिता से पूछें कि वे उनकी प्रशंसा क्यों नहीं करते, परंतु माता डर के मारे ऐसा करने का साहस नहीं जुटा पाती थीं।
अंततः, पिता के प्रति इस कुंठा ने घृणा का रूप ले लिया। एक दिन, क्रोध में आकर, भरवि ने एक भारी डंडा उठाया और अटारी में छिपकर बैठ गए। उनकी योजना थी कि जब पिता नीचे से गुज़रें, तो ऊपर से उनके सिर पर प्रहार करेंगे। संयोग से उसी दिन, माता ने साहस करके पिता से पूछ ही लिया, “सारा राज्य तो हमारे पुत्र की वंदना करता है, किंतु आप एक शब्द भी क्यों नहीं कहते?”
पिता ने मृदु स्वर में उत्तर दिया, “प्रेम में डूबा हुआ हृदय भी कभी-कभी प्रशंसा को रोक लेता है। मैं डरता हूँ कि यदि मैंने उसकी प्रशंसा कर दी, तो उसके जीवन के दिन कम हो जाएंगे और उसकी आत्म-सुधार की प्रबल इच्छा भी शांत हो जाएगी। मेरी चुप्पी उसके उत्कर्ष की कामना है।”
अटारी में छिपे भरवि ने यह वार्तालाप सुन लिया। उनका मन एकाएक ग्लानि और पश्चाताप से भर गया। उन्हें एहसास हुआ कि पिता का निर्विकार प्रेम ही उनकी निस्सीम अपेक्षाओं का कारण था। वे तुरंत डंडा फेंककर नीचे कूदे और पिता के चरणों में गिरकर क्षमा माँगने लगे। उन्होंने पिता को अपनी भयंकर योजना के बारे में सब कुछ बता दिया और दंड की याचना की।
पिता ने उन्हें गले लगाते हुए कहा, “पुत्र, तुम्हें क्षमा तो इसी क्षण हो गया। दंड की कोई आवश्यकता नहीं।” पर भरवि अड़े रहे कि उन्हें दंड मिलना ही चाहिए। तब पिता ने कहा, “ठीक है, यदि दंड ही चाहिए, तो जाओ और अपने ससुराल में अगले छह महीने निवास करो, फिर लौट आना।”
भरवि समझ नहीं पाए कि यह दंड कैसा है, परंतु आज्ञा का पालन करते हुए ससुराल चले गए। प्रथम दिन तो उनका भव्य स्वागत हुआ, उत्तम भोजन मिला। किंतु धीरे-धीरे, दिन बीतने के साथ, उनके प्रति व्यवहार बदलने लगा। छह महीने के अंत तक, ससुराल में उनकी कविता और विद्वता का कोई मूल्य नहीं रह गया। उन्हें एक साधारण नौकर के समान मान लिया गया। उनके जिम्मे रसोई, सफाई, बर्तन धोना, मैले कपड़े साफ करना और खेत का काम लगा दिया गया। वे एक सस्ते मजदूर की भाँति अल्प भोजन पर अति परिश्रम करते रहे।
इन कठिन दिनों में, उन्हें अपना राजा और राज्य याद आया, अपने वेद और काव्य याद आए, अपनी माता याद आईं, और सबसे अधिक – अपने पिता और पितृगृह की याद सताने लगी। तभी अचानक उनकी समझ में आया। उन्होंने उस पितृगृह के मूल्य को पहचान लिया, जहाँ पिता की मौन स्नेहिल दृष्टि ही सर्वोच्च प्रशंसा थी, जहाँ की निश्छल चुप्पी उनके लिए वरदान थी। छह महीने बाद जब वे लौटे, तो एक दंभहीन, कृतज्ञ और गहन अनुभव से समृद्ध कवि के रूप में लौटे।
शिक्षा (Siksha): इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि प्रेम हमेशा प्रशंसा के शब्दों में व्यक्त नहीं होता। कभी-कभी मौन और कठोर प्रतीत होने वाला व्यवहार भी गहन हितचिंतन और अपेक्षा का प्रतीक हो सकता है।