अहंकार का पतन
हैदराबाद के निकट वेमुलवाड़ा नगर में एक शिव मंदिर है, जहाँ राजराजेश्वर स्वामी विराजते हैं। उनके एक भक्त को एक वेश्या से प्रेम हो गया और उससे एक पुत्र उत्पन्न हुआ। भक्त विद्वान था और पुत्र भी प्रतिभाशाली निकला, जिसका नाम बीमा रखा गया। काव्य प्रतिभा के कारण वह “बीमा कवि” के नाम से विख्यात हुआ।
उस समय वेमुलवाड़ा का राजा अत्यंत अहंकारी था। एक दिन बीमा कवि ने अपनी विद्वता दिखाने हेतु राजदरबार में प्रवेश किया, किंतु राजा ने उसे अपमानित कर बाहर फेंकवा दिया। इसका प्रतिशोध लेने के लिए कवि ने नगर की दीवार पर यह शब्द अंकित किए – “हे अहंकारी राजन! पूर्णिमा के तीसरे दिन तुम्हारा राज्य नष्ट हो जाएगा।”
वस्तुतः पूर्णिमा के तीसरे दिन पड़ोसी राजा ने आक्रमण कर अहंकारी राजा को परास्त कर दिया और राज्य हड़प लिया। राजा याचक बनकर वन-वन भटकने लगा। एक दिन भटकते हुए उसकी भेंट बीमा कवि से हुई। अहंकार रहित, विनम्र भाव से राजा ने अपनी दुर्दशा सुनाई। कवि उसकी ईमानदारी से प्रभावित हुआ और बोला, “अगली पूर्णिमा के तीसरे दिन तुम्हारा राज्य पुनः प्राप्त हो जाएगा।”
राजा को विश्वास नहीं हुआ – न सेना थी, न घोड़ा, न धन, न युद्ध का साधन। तभी उसे अपना पुराना मंत्री मिला, जिसने बचाए हुए धन से पुराने सैनिकों और उपमंत्रियों को, जो नए राजा के अधीन मजबूरी में काम कर रहे थे, अपने पक्ष में कर लिया। योजना बनी कि राजा एक नाटक मंडली के साथ महल में प्रवेश करे और विजयी राजा का वध कर दे।
पूर्णिमा के तीसरे दिन, योजना के अनुसार, पुराना राजा महल में घुसा और शत्रु राजा का सिर धड़ से अलग कर दिया। तभी उसका वफादार घोड़ा, तलवार की आवाज पहचानकर, हिनहिनाया और राजा को सुरक्षित निकाल ले गया। मंत्री और पुराने सैनिकों ने शेष सेना को परास्त कर दिया।
बीमा कवि की भविष्यवाणी के अनुसार राजा पुनः सिंहासन पर आसीन हुआ। राज्य मिलते ही राजा और मंत्री ने बीमा कवि के विषय में गंभीर चर्चा की। उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि कवि केवल तभी शाप देता है जब उसका अपमान होता है। अतः भविष्य में उसे कभी नाराज़ नहीं करना है और एक सम्मानित कवि का पूरा आदर देना है।
शिक्षा (Siksha): इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि अहंकार व्यक्ति का सबसे बड़ा शत्रु है और विनम्रता सबसे बड़ा गुण। अपने पद या प्रतिभा के मद में अंधा होकर दूसरों का अपमान करना, विनाश को आमंत्रित करता है।