गुरुभक्त एकलव्य का त्याग - Ekalavya's Sacrifice

गुरुभक्त एकलव्य का त्याग – Ekalavya’s Sacrifice

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गुरुभक्त एकलव्य का त्याग

महाभारत के समय जब पांडव और कौरव द्रोणाचार्य से विद्या प्राप्त कर रहे थे, तब एक विलक्षण छात्र एकलव्य नामक निषाद कुमार भी धनुर्विद्या सीखने की अभिलाषा रखता था। द्रोणाचार्य हस्तिनापुर से दूर अपने आश्रम में राजकुमारों को शिक्षा देते थे। एकलव्य वहाँ चुपचाप छिपकर पूरी प्रक्रिया देखा करता था। उसने हिम्मत जुटाकर द्रोणाचार्य से निवेदन किया कि वे उसे भी अपना शिष्य बना लें।

द्रोणाचार्य ने उस निषाद बालक से कहा कि वे केवल क्षत्रियों और राजकुमारों को ही शिक्षा देते हैं। एकलव्य निराश तो हुआ, परंतु उसने धनुर्विद्या सीखने का दृढ़ संकल्प नहीं छोड़ा। वह फिर से गुप्त रूप से द्रोणाचार्य को अर्जुन को सिखाते हुए देखने लगा। तत्पश्चात उसने मिट्टी की द्रोणाचार्य की एक मूर्ति बनाई और उसे अपना गुरु मानकर उसके सामने अभ्यास करने लगा। वह हर वह क्रिया जो द्रोण ने अर्जुन को सिखाई, उसी श्रद्धा से मूर्ति के सामने दोहराता। अल्प समय में ही एकलव्य अर्जुन के समान ही कुशल धनुर्धर बन गया।

एक दिन एकलव्य ने द्रोणाचार्य के पास जाकर कहा कि उसने वे सभी विद्याएँ सीख ली हैं जो उन्होंने अर्जुन को सिखाई थीं। द्रोणाचार्य ने जब उसकी परीक्षा ली, तो वे चकित रह गए। एकलव्य वास्तव में अर्जुन के समान ही निपुण था। यह द्रोण के लिए एक गंभीर समस्या बन गई।

द्रोणाचार्य अर्जुन को विशेष रूप से प्रशिक्षित कर रहे थे, क्योंकि उन्हें राजा द्रुपद द्वारा दिए गए अपमान का प्रतिशोध लेना था। उनका विश्वास था कि केवल अर्जुन ही राजाओं के अहंकार को समझकर उन पर विजय प्राप्त कर सकता है, क्योंकि वह राजसी वातावरण में पला-बढ़ा था। एक समान कौशल वाला निषाद लड़का उनकी योजना के लिए अनुपयोगी था। साथ ही, द्रोण को यह भी आशंका थी कि कोई दुष्ट शक्तियाँ एकलव्य का उपयोग अर्जुन के विरुद्ध कर सकती हैं। परिस्थितियों के दबाव में द्रोण ने एक योजना बनाई।

जब एकलव्य ने गुरुदक्षिणा माँगने का आग्रह किया, तो द्रोणाचार्य ने उससे उसके दाहिने हाथ का अंगूठा माँगा। धनुष चलाने के लिए दाहिने हाथ का अंगूठा अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। एकलव्य ने क्षण भर की भी हिचकिचाहट के बिना, अपने हाथ का अंगूठा काटकर गुरु के चरणों में अर्पित कर दिया। द्रोणाचार्य ने तुरंत उसे आशीर्वाद दिया कि वह समस्त निषाद धनुर्धरों का आदि गुरु बनेगा और उसकी यह नि:स्वार्थ भक्ति सदैव स्मरण की जाएगी।

शिक्षा:  गुरु की अनुमति एवं कृपा के बिना प्राप्त विद्या पूर्ण फलदायी नहीं होती।

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