वचन के धनी कर्ण
महाभारत का युद्ध प्रारंभ होने से पहले, पांडवों की माता कुंती देवी कर्ण से मिलने गईं। कर्ण कुंती देवी का ज्येष्ठ पुत्र था, परंतु विवशतावश उन्होंने उसे त्याग दिया था। अब कर्ण एक पराक्रमी योद्धा बन चुका था और पांडवों के विरुद्ध युद्ध में था। वह कौरव सेना के अग्रणी दुर्योधन का परम मित्र था। इस कौरव-पांडव युद्ध में कुंती को आशंका थी कि उनके पांच पांडव पुत्रों में से कुछ अवश्य ही कर्ण द्वारा मारे जाएंगे। यही कारण था कि वे कर्ण से मिलने पहुंची।
इस भेंट में कुंती देवी ने कर्ण से अनुरोध किया कि वह उनके पांच पांडव पुत्रों, जो उसके अपने ही भाई थे, को न मारे। किंतु कर्ण ने उत्तर दिया कि उसने अपने परम मित्र दुर्योधन को वचन दिया है कि वह श्रेष्ठ धनुर्धर अर्जुन का वध करेगा। उसने यह प्रतिज्ञा अपनी माता कुंती के समक्ष दोहराई और कहा कि वह शेष चार पांडवों – धर्मराज युधिष्ठिर, भीम, नकुल और सहदेव – के प्राण बख्श देगा, परंतु अर्जुन को मृत्यु से नहीं बचा सकता।
कर्ण दुर्योधन का ऋणी था, क्योंकि एक सारथि-पुत्र मात्र होने से दुर्योधन ने ही उसे अंग देश का राजा, ‘अंगराज’ बनाया था। अतः कर्ण ने माता से तर्क दिया कि युद्ध के पश्चात भी उनके पांच पुत्र रहेंगे, जिनमें वह स्वयं भी शामिल होगा। युद्ध के बाद या तो अर्जुन जीवित रहेगा या वह स्वयं।
शीघ्र ही युद्ध आरंभ हुआ। युद्ध के दौरान अनेक अवसर ऐसे आए जब कर्ण धर्मराज, भीम, नकुल और सहदेव को मार सकता था। परंतु कर्ण ने अपनी माता को दिए वचन का पालन किया और हर बार उनके प्राण छोड़ दिए। साथ ही, उसने अपने मित्र दुर्योधन को दिए वचन का भी मान रखा और अनेक युद्धों में केवल अर्जुन से ही भिड़ा। अंततः, अर्जुन ने ही कर्ण का वध किया, कर्ण ने अर्जुन का नहीं। परंतु कर्ण इतिहास में एक ऐसे व्यक्ति के रूप में अमर हो गया, जिसने अपनी माता और अपने परम मित्र – दोनों को दिए वचनों की रक्षा की। उसके लिए वचनबद्धता ही उसका सर्वोच्च धर्म था। अपने वचनों के बीच उसे दो ध्रुवों में खींचती हुई नियति ने उसके चरित्र की दृढ़ता और त्याग को ही उजागर किया।
शिक्षा: वचन-पालन सर्वोच्च धर्म है, निष्ठा और कर्तव्यनिष्ठा व्यक्ति को महान बनाती है।