दानवीर कर्ण का त्याग
बारिश की झड़ी लगी हुई थी। मूसलाधार वर्षा ने सब कुछ भिगो दिया था। उसी बीच एक ब्राह्मण यज्ञ की सामग्री जुटाने के लिए निकला था। उसे यज्ञ के लिए सूखी लकड़ियों की आवश्यकता थी, किंतु वर्षा के कारण बाहर का समस्त काष्ठ भीगा हुआ था। निराश ब्राह्मण सबसे पहले हस्तिनापुर के राजकुमार दुर्योधन के दरबार में पहुँचा। उसने हाथ जोड़कर निवेदन किया, “हे राजकुमार, मैं एक यज्ञ संपन्न करना चाहता हूँ। इसके लिए मुझे सूखी लकड़ियों की आवश्यकता है। कृपया मेरी सहायता कीजिए।”
दुर्योधन ने बाहर हो रही मूसलाधार वर्षा की ओर देखा और ठंडे स्वर में उत्तर दिया, “इस प्रकार के मौसम में सूखी लकड़ी कहाँ से ला दूँ? मेरे पास तुम्हारे लिए कुछ भी नहीं है।” ब्राह्मण को खाली हाथ लौटा दिया गया।
तब किसी ने ब्राह्मण को सलाह दी, “हे ब्राह्मण देव, तुम महादानी कर्ण के पास जाओ। वे कभी किसी को खाली हाथ नहीं लौटाते।” आशा की एक किरण लेकर ब्राह्मण अंगदेश के राजा कर्ण के महल की ओर चल पड़ा। महल में पहुँचकर उसने अपनी व्यथा सुनाई, “हे दानवीर, यज्ञ के लिए सूखी लकड़ी की आवश्यकता है, किंतु सारी लकड़ी वर्षा में भीग गई है।”
कर्ण ने ब्राह्मण की ओर देखा। उनकी विनम्रता और आवश्यकता को समझते हुए भी वे जानते थे कि बाहर सब कुछ गीला है। उन्होंने एक क्षण भी नहीं सोचा। कर्ण ने अपने महल के भीतर नज़र दौड़ाई, जहाँ सुंदर नक्काशीदार लकड़ी के खंभे, दरवाज़े, खिड़कियाँ और मेहराबें थीं। उन्होंने तत्काल अपने सेवकों को आदेश दिया, “इस महल के सभी लकड़ी के भाग तोड़ दो और इस ब्राह्मण की भेंट कर दो।”
सेवक हैरान रह गए। उनमें से एक ने हिम्मत करके कहा, “महाराज, यदि ये सभी लकड़ी के भाग तोड़ दिए गए, तो यह महल खंडहर हो जाएगा। बारिश अंदर तक आने लगेगी।” कर्ण मुस्कुराए और उनका उत्तर था, “एक ब्राह्मण की धार्मिक आकांक्षा पूरी करना, इस महल की सुंदरता से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। मेरे लिए देना ही सबसे बड़ा धर्म है।”
और फिर क्या था? सेवकों ने महल के सभी लकड़ी के खंभे उखाड़ दिए, दरवाज़े और खिड़कियाँ तोड़ दीं, सजावटी मेहराबें नीचे उतार दीं। थोड़े ही समय में सूखी लकड़ियों का एक विशाल ढेर लग गया। कर्ण ने वह सारा काष्ठ ब्राह्मण के चरणों में समर्पित कर दिया। उन्होंने न तो अपने महल की चिंता की, न ही भविष्य की। केवल वर्तमान में सामने खड़े याचक की पूर्ति ही उनका एकमात्र ध्येय था।
ब्राह्मण की आँखें आश्चर्य और कृतज्ञता से भर गईं। उसने कर्ण को आशीर्वाद देते हुए कहा, “हे महादानी! जब तक इस पृथ्वी पर सूर्य और चंद्रमा का अस्तित्व रहेगा, तब तक आपका नाम ‘दान कर्ण’ के रूप में स्मरण किया जाएगा। आपकी यह दानलीला इतिहास में अमर रहेगी।” इतना कहकर वह प्रसन्नतापूर्वक यज्ञ की सामग्री लेकर चला गया।
कर्ण खंडहर हुए महल में खड़े रहे, किंतु उनके मुखमंडल पर एक अद्भुत तेज और संतोष था। उनके लिए दान का अर्थ केवल अतिरिक्त वस्तु देना नहीं था, बल्कि अपने पास मौजूद सब कुछ, यहाँ तक कि अपने आश्रय को भी, जरूरतमंद के चरणों में अर्पित कर देना था। उनकी इसी निस्वार्थ उदारता ने उन्हें महाभारत के सभी योद्धाओं में सबसे विशिष्ट बना दिया।
शिक्षा: निस्वार्थ दान सर्वोच्च धर्म है।