किरातार्जुनीयम्
पांडव वीर अर्जुन अद्वितीय धनुर्धर थे, किन्तु उनमें भक्ति या श्रद्धा का नितांत अभाव माना जाता था। अपनी असीम शक्ति और कौशल के मद में वे ईश्वर की भक्ति को अनावश्यक समझते थे। इसी अभिमान को तोड़ने के लिए भगवान शिव ने ‘किरातार्जुनीयम्’ की लीला रची—एक ऐसा युद्ध जहाँ अर्जुन का प्रतिद्वंद्वी स्वयं महादेव थे।
एक दिन अर्जुन वन में एक महिष (भैंसा) का शिकार कर रहे थे। तभी भगवान शिव भी एक किरात (वनवासी शिकारी) का रूप धरकर उसी महिष का पीछा करने लगे। दोनों ने एक साथ उस पर बाण चलाए—कुछ अर्जुन के गांडीव धनुष से, कुछ शिव के धनुष से। अंततः महिष वीरगति को प्राप्त हुआ। दोनों ने उस पर अपना अधिकार जताया। अर्जुन बोले, “यह मेरा शिकार है!” किरातरूपी शिव भी वही दावा करने लगे।
इस प्रकार, दोनों के बीच युद्ध छिड़ गया। अर्जुन ने गांडीव पर प्रलय के समान बाण चलाए, किंतु आश्चर्य! उनके सारे बाण व्यर्थ गए। उनकी दृष्टि धुँधली हो गई, दिशाएँ भ्रमित हो गईं, और कोई भी बाण शिव को छू तक नहीं पाया। क्रोधित अर्जुन ने अंततः एक भाला शिव के मस्तक पर दे मारा, किंतु भाला लौटकर स्वयं अर्जुन के ही हृदय पर लगा और वे मूर्छित होकर भूमि पर गिर पड़े।
जब अर्जुन की चेतना लौटी, तो सामने किरात के स्थान पर भगवान शिव माता पार्वती सहित प्रकट थे। अर्जुन तत्काल शिव के चरणों में गिर पड़े और मोक्ष की याचना करने लगे। उन्होंने कहा, “प्रभु, इस जन्म-मृत्यु के चक्र से मुझे मुक्ति दीजिए।”
भगवान शिव मुस्कुराए और बोले, “हे अर्जुन, इस जन्म में तुम्हारा उद्देश्य मुझसे पाशुपतास्त्र प्राप्त कर युद्ध जीतना और महान धनुर्धर बनना है। परन्तु अगले जन्म में तुम भक्त कन्नप्प के रूप में जन्म लोगे, एक साधारण शिकारी बनकर। तब तुम्हारा एकमात्र उद्देश्य मेरी भक्ति करते हुए मोक्ष और सायुज्य (मेरे साथ एकात्मता) प्राप्त करना होगा।”
इस प्रकार, अर्जुन को अपने अहंकार का बोध हुआ और उन्होंने जाना कि बिना भक्ति के शक्ति निष्फल है। भगवान शिव ने उन्हें पाशुपतास्त्र प्रदान किया और आशीर्वाद दिया कि वे महाभारत के युद्ध में धर्म की विजय के साधन बनेंगे।
शिक्षा (Siksha): इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि व्यक्ति की शारीरिक या बौद्धिक शक्ति चाहे कितनी भी महान क्यों न हो, वह ईश्वरीय कृपा और विनम्र भक्ति के बिना अधूरी है। अहंकार मनुष्य को अंधा बना देता है और उसकी सारी क्षमताओं को निष्फल कर देता है।