एक बार एक छोटी लाल मुर्गी एक फार्म पर रहती थी। उसकी दोस्ती एक आलसी कुत्ते, एक निद्रा में डूबी बिल्ली और एक शोर मचाने वाले पीले बतख से थी। एक दिन लाल मुर्गी को जमीन पर कुछ बीज मिले। उसके मन में एक विचार आया। वह इन बीजों को बोएगी। लाल मुर्गी ने अपने दोस्तों से पूछा, “मेरी बीज बोने में कौन मदद करेगा?” आलसी कुत्ते ने भौंकते हुए कहा, “मैं नहीं।” नींद में डूबी बिल्ली ने दहाड़ते हुए कहा, “मैं नहीं।” शोर करने वाले पीले बतख ने कां-कां करते हुए कहा, “मैं नहीं।” लाल मुर्गी बोली, “तो फिर मैं ही करूंगी।” और उसने अकेले ही सारे बीज बो दिए।
जब बीज बढ़कर गेहूं के पौधे बन गए, तो मुर्गी ने फिर पूछा, “इस गेहूं को काटने में कौन मदद करेगा?” तीनों दोस्तों ने फिर वही जवाब दिया, “मैं नहीं।” अतः लाल मुर्गी ने अकेले ही सारा गेहूं काट लिया। गेहूं कट जाने के बाद उसने पूछा, “इस गेहूं को चक्की पर पीसने ले जाने में कौन मेरा साथ देगा?” फिर से तीनों ने मदद से इनकार कर दिया। लाल मुर्गी ने स्वयं गेहूं चक्की पर ले जाया, आटा पिसवाया और आटे का भारी बोझ अकेले ही खेत तक वापस ले आई।
थकी हुई मुर्गी ने पूछा, “इस आटे से रोटी बनाने में कौन मेरी सहायता करेगा?” आलसी कुत्ते, सुस्त बिल्ली और शोरिया बतख ने एक बार फिर मदद करने से मना कर दिया। लाल मुर्गी ने अकेले ही सारी रोटियाँ सेंक लीं।
जब रोटी तैयार हो गई, तो थकी हुई लाल मुर्गी ने अंतिम प्रश्न पूछा, “इस रोटी को खाने में कौन मेरी मदद करेगा?” इस बार तीनों दोस्त एक साथ बोले, “मैं करूंगा!” लाल मुर्गी ने दृढ़ता से कहा, “नहीं! मैं ही करूंगी।” और उसने सारी रोटी अकेले ही खा ली।
इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि मेहनत का फल मेहनत करने वाले को ही मिलना चाहिए। जो काम में साथ न दे, वह फल का हकदार भी नहीं होता।