हारा हुआ सैनिक – 36

एक बार राजा, एक सैनिक और रमन विजयनगरम के एक दूरदराज के इलाके में गए, जहाँ निम्न जाति के लोग रहते थे। गाँव वाले एक असभ्य जीवन शैली का पालन करते थे। वे मरे हुए जानवरों और पक्षियों का मांस खाते थे। लेकिन वे जानवरों और पक्षियों को मारकर नहीं खाते थे। सभ्य लोग उनसे इस तरह की जीवन शैली के कारण घृणा करते थे।
सैनिक ने अपनी बड़ाई करते हुए कहा, ‘मैं मरे हुए जानवर का मांस नहीं खाता, चाहे मुझे कितनी भी कठिनाई क्यों न झेलनी पड़े।’ रमन को यह बात पसंद नहीं आई। रमन ने कहा, ‘अगर मुझे ऐसे हालात में रहना पड़े, तो मैं भी वही खाऊंगा जो वे देंगे।’ लेकिन सैनिक मरे हुए जानवर का मांस न खाने के अपने पहले वाले रुख पर कायम रहा। सैनिक के इस दमखम को रमन ने पसंद नहीं किया और उसे चुनौती दे दी। राजा ने रमन द्वारा रखी गई इस चुनौती को स्वीकार कर लिया।
राजा ने सैनिक के रहने की व्यवस्था उसी गाँव में करवा दी, जहाँ अछूत लोग रहते थे। उसे गाँव छोड़कर जाने की अनुमति नहीं थी। गाँव वाले मरे हुए जानवर के मांस के अलावा केवल रागी ही खाते थे। लेकिन सैनिक को रागी पसंद नहीं थी। उसे एक सप्ताह तक बिना किसी भोजन के रहना पड़ा। वह दुबला हो गया। सैनिक को संदेह हुआ कि कहीं वह भूख से मर न जाए। आखिरकार उसे मरे हुए जानवर का मांस और रागी खाना ही पड़ा। रमन की शर्त जीत गई। सैनिक ने अपनी हार स्वीकार कर ली।
सूदखोर को सजा – 37

विजयनगर में रत्नचंद्रन नाम का एक सूदखोर रहता था। वह लोगों से कर्ज़ के बदले भारी ब्याज वसूलता था। जबकि वह पचास प्रतिशत ब्याज लेता था, दूसरे सूदखोर केवल दस से पंद्रह प्रतिशत ब्याज लेते थे। रत्नचंद्रन द्वारा लिए जाने वाले अत्यधिक ब्याज के बारे में रमन को पता चला। उसने सूदखोर को सबक सिखाने का निश्चय किया। रमन ने रत्नचंद्रन से पाँच तांबे की थालियाँ उधार लीं। यह उधारी उसके मित्र योगय्या के माध्यम से ली गई थी। जब उसने थालियाँ लौटाईं तो उसके अतिरिक्त पाँच छोटे बर्तन भी थे।
रत्नचंद्रन हैरान रह गया। उसने पूछा, ‘ये छोटे बर्तन क्यों हैं?’ योगय्या ने कहा, ‘ये बड़ी थालियों द्वारा दिए गए बर्तन हैं।’ एक चालाक और लालची सूदखोर होने के नाते रत्नचंद्रन भी छोटे बर्तनों पर कब्जा करने के लिए उत्सुक था। उसने कहा, ‘ठीक है। मैं भूल गया था कि तुम्हें याद दिलाऊं कि उधार देते समय थालियाँ गर्भवती थीं।’ वह सभी बर्तनों को अपने कमरे में ले गया।
एक सप्ताह बाद, रमन ने फिर योगय्या को बुलाया और कहा, ‘तुम जाओ और दो सोने की थालियाँ कर्ज़ के रूप में उधार लो।’ रत्नचंद्रन ने बिना किसी हिचकिचाहट के सोने की थालियाँ दे दीं। उसने योगय्या को याद दिलाया कि सोने की थालियाँ गर्भवती हैं। उसने कहा, ‘जब तुम लौटकर आओगे तो बच्चे वाली थालियाँ भी लौटाना।’ रत्नचंद्रन की चालाकी काम करने लगी।
योगय्या सोने की थालियाँ लेकर रमन के घर पहुँचा। रमन ने थालियों को पिघलाया और उन्हें छोटी थालियों में बदल दिया। उसने पिघली हुई छोटी थालियाँ उन लोगों को दे दीं, जो पहले रत्नचंद्रन के हाथों पीड़ित हुए थे। दो दिन बाद, रत्नचंद्रन ने योगय्या को बुलाया और सोने की थालियों की माँग की। वह सोने की थालियों और छोटे बर्तनों की अपेक्षा कर रहा था।
योगय्या ने उत्तर दिया कि माँ और बच्चे वाले बर्तन प्रसव के समय मर गए। रत्नचंद्रन को मूर्ख बनाने के लिए रमन ने उसे अच्छी तरह सिखा दिया था। निराश सूदखोर राजा के पास पहुँचा और शिकायत की। रमन ने मामले में हस्तक्षेप किया और राजा को पूरी घटना सुनाई। राजा ने कर्ज़ पर अत्यधिक ब्याज वसूलने के लिए रत्नचंद्रन को गिरफ्तार करने का आदेश दिया।
चापलूसी रमन को नापसंद – 38

तेनाली रमन और दरबारी पुजारी ताताचार्य की आदतें और तौर तरीके अलग थे। जबकि ताताचार्य अपने स्वार्थी मकसद से राजा की प्रशंसा करता था, रमन ठीक उसके उलट था। वह राजा की आलोचना करने में भी नहीं हिचकिचाता था। वह व्यक्तिगत लाभ के लिए किसी की चापलूसी नहीं करता था।
एक बार राजा ने महल में भव्य भोज का आयोजन किया। ताताचार्य और रमन ने भी इसमें भाग लिया। ताताचार्य ने कहा, ‘क्या संसार में राजा के आतिथ्य और भोजन देने से अधिक सुख देने वाली कोई चीज है?’ रमन को पुजारी की यह चापलूसी पसंद नहीं आई। रमन ने जवाब दिया, ‘भव्य भोज से अधिक सुखद शौच है।’
राजा कृष्णदेव राय को भी रमन का यह जवाब पसंद नहीं आया। उन्होंने बीच में हस्तक्षेप किया। रमन ने अपना मत सही साबित करने की सहमति दी। राजा ने सिर हिलाकर स्वीकृति दे दी। रमन ने प्राकृतिक आवश्यकता के समय राजा को एक बंद कमरे में रख दिया। राजा को शीघ्र शौचालय पहुँचना था। लेकिन रमन ने उन्हें एक बंद कमरे में फँसा दिया था। राजा बेचैन हो गए। पेट दर्द से वह चिल्लाने लगे। अंत में रमन आया और दरवाजा खोला। राजा ने अच्छे से शौच किया। उन्हें राहत मिली। शौचालय से बाहर आकर राजा ने रमन को मुक्त कराने के लिए धन्यवाद दिया। राजा ने राहत की साँस ली। रमन ने पूछा, ‘महाराज, भोजन से अधिक सुखद शौच है, है न?’ राजा के पास कोई दूसरा जवाब नहीं था। इस प्रकार रमन ने एक बार फिर अपनी बुद्धिमत्ता और चतुराई साबित की।
पहलवान भाग गया – 39

एक बार दिल्ली का एक पहलवान विजयनगर आया। उसने विभिन्न मल्लयुद्ध प्रतियोगिताओं में भाग लिया। दिल्ली के पहलवान से सब हार गए। राजा को इस बात पर शर्मिंदगी महसूस हुई। वह पहलवान को पराजित देखना चाहते थे।
अंततः राजा ने तेनाली रमन से सहायता मांगी। रमन ने पहलवान को विजयनगर से भगाने की सहमति दी। रमन को मल्लयुद्ध का कोई ज्ञान नहीं था। लेकिन वह पहलवान को बाहर खदेड़ने के बारे में पूरी तरह आश्वस्त था। रमन उससे मिला और पूछा, ‘क्या तुम्हें अंक विद्या की चालें आती हैं?’ पहलवान हैरान रह गया। वह चुप रहा। रमन ने उसे दिलासा दिया और मल्लयुद्ध में नए खेल के बारे में बताया।
पहलवान समझ नहीं पाया कि रमन क्या बात कर रहा है। उसे कुछ संदेहास्पद लगा। उसने पहले कभी अंक विद्या का खेल नहीं सुना था। पहलवान ने मैदान में उतरे बिना ही विजयनगर से भागने की योजना बनाई। इस उद्देश्य से उसने लकड़हारे का वेश धारण किया और आधी रात को विजयनगर से भाग गया।
अंत में तेनाली रमन विजयी हुआ। राज्य का गौरव बनाए रखने के लिए राजा ने रमन को एक हज़ार सोने के सिक्के भेंट किए।
एक विद्वान पराजित हुआ – 40

राजा कृष्णदेव राय अपनी आतिथ्य सत्कार के लिए प्रसिद्ध थे। वे जीवन के हर क्षेत्र के विद्वानों का स्वागत करते थे। एक बार उड़ीसा का एक विद्वान विजयनगर पहुँचा। उसने दरबार के सदस्यों को शास्त्रार्थ के लिए चुनौती दी। हर कोई उस विद्वान का सामना करने से डर रहा था। वे उसकी योग्यताओं और पिछले रिकॉर्ड के बारे में जानते थे। राजा ने अपने दरबार के विद्वानों को आगे आकर अतिथि को चुनौती देने के लिए कहा। सभी ने विद्वान का सामना करने की स्थिति से बचने की कोशिश की। अंत में राजा ने रमन से सहायता मांगी। वह किसी भी कीमत पर अपने राज्य की प्रतिष्ठा बचाना चाहते थे।
रमन ने विद्वान का सामना करने की सहमति दी। उसने लाल रेशमी कपड़े में लिपटी एक पुस्तक विद्वान के सामने रख दी। विद्वान चिंतित हो गया। उसने रमन से पूछा, ‘यह क्या है?’ रमन ने उत्तर दिया, ‘यह ‘तिलकष्ट महिष बंधनम्’ नामक पुस्तक है।’ विद्वान आश्चर्यचकित रह गया। उसने अपने मन में कहा, ‘मैंने ऐसी पुस्तक का नाम तक नहीं सुना।’ रमन ने विद्वान को अगले दिन उसी पुस्तक के आधार पर शास्त्रार्थ की चुनौती दी। विद्वान को चुनौती स्वीकार करनी पड़ी। वह उस दुर्लभ पुस्तक के बारे में सोचकर उस रात सो नहीं पाया। विद्वान ने विजयनगर से भागने की योजना बनाई। इस उद्देश्य से उसने राजा से झूठ कहा कि वह बीमार है। वह उड़ीसा लौट गया और उस पुस्तक की खोज की परंतु वह नहीं मिली। ‘तिलकष्ट महिष बंधनम्’ नाम की कोई पुस्तक थी ही नहीं।
अगले दिन राजा ने रमन को बुलाया और विद्वान को भगाने की उसकी चाल के बारे में पूछा। रमन ने रेशमी आवरण खोला और राजा को दिखाया। आवरण के अंदर कोई पुस्तक नहीं थी, बल्कि केवल तिल, लकड़ी और एक रस्सी थी। उसने कहा, ‘तिलम का अर्थ है तिल, कष्ट का अर्थ है लकड़ी और महिष बंधनम् का अर्थ है भैंस बाँधने की रस्सी।’ राजा रमन के साथ जोर से हँस पड़े। उन्होंने रमन को इनाम के रूप में एक हीरे की अंगूठी दी।