The-Reward-for-Insult--18

तेनाली रमन की चतुराई भरी कहानियाँ और उसकी समस्याओं का हल – 16 से 20

तेनालीराम की कहानियाँ

धोबी की पत्नी को पेंशन – 16

The-Washerman's-Wife's-Pension--16

राजा बहुत उदास था। उसने सोचा कि रमन मर गया है। एक साधु की हत्या के आरोप में रमन को मारने का आदेश उसी ने दिया था। मृत साधु के अपराधी होने का पता चलने पर राजा को गहरा दुख हुआ।

हालाँकि हत्या का दोषी रमन ही था, पर उस कार्य ने कई निर्दोष लोगों की जान बचाई। राजा की आँखों से आँसू बहने लगे। यह जानकर रमन स्वयं राजा के सामने प्रकट हुआ। उसने मृत्युदंड से बच निकलने की पूरी कहानी सुनाई।

राजा को धोबी के परिवार पर दया आई। उसने धोबी की पत्नी को पेंशन दिए जाने का आदेश दिया। एक वर्ष बाद उसका विवाह एक सीधे कद के व्यक्ति से हो गया।

 रमन का पुनर्जन्म – 17

Raman's-Rebirth--17

रमन ने एक बार राजा कृष्णदेवराय से एक सौ स्वर्ण मुद्राएँ उधार लीं। किंतु वह लंबे समय के बाद भी उसे लौटा नहीं सका। राजा के प्रबंधक ने धन की मांग करते हुए रमन के पास एक दूत भेजा। परंतु रमन के पास उस समय धन नहीं था। उसे अन्य ऋण भी चुकाने थे।

रमन ने दूत से कहा कि अभी उसके पास धन नहीं है, वह बाद में चुका देगा। दूत के जाने के बाद रमन मृतक की भांति शय्या पर लेट गया। शरीर को ऊपर से नीचे तक सफेद कपड़े से ढक दिया गया। उसकी माता और पत्नी ‘शव’ के पास बैठकर जोर-जोर से विलाप करने लगीं। रोने की आवाज सुनकर पड़ोसी रमन के घर एकत्रित हुए। उन्होंने रमन को मृत पड़ा देखा। श्रद्धांजलि देने राजा भी वहां पहुंचे।

राजा ने रमन की माता और पत्नी को सांत्वना दी। उन्होंने पूछा कि रमन का इतनी शीघ्रता से देहांत कैसे हो गया। रमन की माता ने राजा को बताया कि उसके पुत्र को कोई रोग नहीं था। उसने राजमहल से एक सौ स्वर्ण मुद्राएँ उधार ली थीं। आज एक दूत यहां धन मांगने आया था। तुरंत ही रमन शय्या पर लेट गया और तब से नहीं उठा। उसने मुझसे कहा कि वह धन चुका दूं। यह मेरे पुत्र का अंतिम इच्छा-वचन था।

यह सुनकर राजा ने तत्काल अपने प्रबंधक को बुलवाया। राजा ने आदेश दिया कि रमन द्वारा लिया गया सारा ऋण माफ कर दिया जाए। उसकी माता को इस विषय में दुखी नहीं होना चाहिए। जैसे ही राजा ने यह आदेश घोषित किया, रमन ने सफेद कपड़े हटाकर शय्या से जाग गया।

राजा स्तब्ध रह गए और थोड़ा पीछे हट गए। रमन हंसा और राजा के समक्ष झुक गया। उसने कहा कि हे स्वामी, भयभीत न हों। आपकी उदारता सुनकर मैं मृत्यु से पुनर्जीवित हो उठा हूं। राजा ने पूछा कि जब ऋण राशि माफ हुई तभी तुम पुनर्जीवित हुए, तो मृत्यु हुई कैसे। रमन हंसते हुए बोला कि ऋण के बोझ से मेरी मृत्यु हुई थी। जब आपने वह बोझ हटा दिया, तो जीवन लौट आया।

यह सुनकर राजा भी हंस पड़े। उन्होंने रमन का वेतन बढ़ा दिया। परिणामस्वरूप रमन ने फिर कभी ऋण के रूप में धन उधार नहीं लिया।

अपमान का पुरस्कार – 18

The-Reward-for-Insult--18

राजा कृष्णदेवराय ने एक घोड़ा खरीदा। वह अत्यंत प्रशिक्षित पशु था। घोड़ा अनेक आश्चर्यजनक करतब दिखाता, जिससे सैनिक चकित रह जाते। लोग घोड़े की प्रशंसा करने लगे।

एक दिन राजा तुंगभद्रा नदी पर बने पुल के ऊपर घोड़े पर बैठकर व्यायाम कर रहे थे। रमन पास आया और व्यायाम देखने लगा। उसने राजा से कहा, “आपका घोड़ा अच्छा है। पर क्या आपका घोड़ा वे सभी करतब कर सकता है, जो मेरा घोड़ा करता है?” राजा ने उत्तर दिया, “हाँ, निश्चित ही। अपना घोड़ा लाओ, देखते हैं।” उन्हें रमन द्वारा अपने घोड़े का अपमान करना अच्छा नहीं लगा।

रमन शीघ्र ही एक घोड़ा ले आया। वह दुर्बल पशु था। केवल हड्डियों और चमड़े का बना वह घोड़ा अकालग्रस्त पशु जैसा दिखता था। यदि कोई उसकी पीठ पर चढ़ता, तो वह गिर पड़ता। घोड़े की दशा इतनी दयनीय थी।

रमन घोड़े को खींचता और धकेलता लाया। राजा देख रहे थे कि रमन घोड़े के साथ क्या कर रहा है। जब घोड़ा पुल के मध्य में पहुँचा, तो रमन ने उसे नदी में धकेल दिया। वह कुछ देर तक सुरक्षित तैरता रहा, पर अंततः चोटों के कारण दम तोड़ दिया। स्वास्थ्य की खराब दशा के कारण घोड़ा बच नहीं सका।

यह देखकर राजा क्रोधित हो गए। उन्होंने कहा, “रमन, तुमने क्या किया? तुमने घोड़े को नदी में धकेलकर मार डाला।” रमन ने उत्तर दिया, “हाँ प्रभु, मैंने यह आपके घोड़े को बचाने के लिए किया। आपका घोड़ा इस प्रकार का व्यायाम नहीं कर सकता।” राजा ने घोड़े की मृत्यु के लिए रमन की आलोचना की।

परंतु रमन का तर्क विचित्र था। उसने कहा, “प्रभु, एक निरर्थक मित्र की हानि कोई हानि नहीं है। कभी-कभी यह लाभ भी दे सकती है।” राजा ने रमन का तर्क स्वीकार कर लिया। उन्होंने रमन को धन से भरा एक थैला भी पुरस्कार में दिया।

मांसाहारी घोड़ा – 19

The-Carnivorous-Horse--19

घोड़ा शाकाहारी प्राणी है। परंतु कभी-कभी आवश्यकता पड़ने पर उसे मांसाहारी भी बनाना पड़ता है। यह कहानी है कि कैसे रमन ने अपने घोड़े को मांसाहारी बनाया।

एक वर्षा के दिन का संध्या काल था। रमन ने उस दिन वर्षा की आशा नहीं की थी। वह घोड़े पर सवार होकर चल पड़ा। कुछ समय बाद वर्षा प्रारंभ हो गई। वह लौटा नहीं, अपनी यात्रा जारी रखी। वर्षा निरंतर होती रही। रमन आगे बढ़ता गया। वह पूरी तरह भीग गया।

जब उसे कंपकंपी होने लगी, तो रमन निकट की एक दुकान में घुस गया। घोड़ा दुकान के सामने बांध दिया गया। दुकान पर मांस के कटलेट बिक रहे थे। वह ठंड से कांप रहा था। किसी प्रकार की गर्मी से यह कंपकंपी दूर हो सकती थी। परंतु लोग चूल्हे के चारों ओर घिरे प्रतीत होते थे। रमन दुविधा में था।

उसने दुकानदार से कहा, “मेरा घोड़ा भूखा है। उसे चार मांस कटलेट चाहिए।” परंतु लोग आश्चर्य करने लगे। एक व्यक्ति बोला, “क्या घोड़ा मांस कटलेट खाएगा? मैं घोड़ा देखना चाहता हूं।” वह दुकान के बाहर घोड़ा देखने गया। सभी लोग उसके पीछे हो लिए। वे सभी उस अजीब घोड़े को देखने लगे।

इस बीच रमन चूल्हे के पास बैठ गया और अपने वस्त्र सुखा लिए। शरीर की कंपकंपी और ठंड भी दूर हो गई। वर्षा भी कम हो गई। रमन ने कटलेट खरीदे और बाहर गया। उसने घोड़े को कटलेट दिखाया। परंतु घोड़े ने कोई ध्यान नहीं दिया। रमन ने कटलेट पास खड़े एक कुत्ते को दे दिए। वह घोड़े पर सवार हो गया। लोग उत्सुकता से घोड़े को नहीं, बल्कि रमन को देख रहे थे।

 मानव बलि -20

The-Human-Sacrifice--20

प्राचीन भारत में मानव बलि एक सामान्य प्रथा थी। आज भी कुछ असभ्य लोगों द्वारा मानव बलि की घटनाएं सुनने को मिलती हैं। कृष्णदेवराय के शासनकाल में विजयनगर साम्राज्य में मानव बलि पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। परंतु यदि किसी समस्या का समाधान केवल मानव बलि ही हो, तो क्या किया जा सकता है?

रमन ने मानव बलि करने का एक मार्ग खोज निकाला। राजा द्वारा तुंगभद्रा नदी पर बनवाया गया एक पुल, निर्माण पूर्ण होने से पहले ही बह गया। जनता के बीच यह अंधविश्वास फैल गया कि पुल का विनाश किसी भूत के क्रोध के कारण हुआ है।

लोग कहने लगे कि भूत को पुल पसंद नहीं आया। भूत को शांत करने के लिए मानव बलि अनिवार्य है। एक साधु ने भी यही राय दी कि यदि बलि नहीं दी गई तो पुल पूरा होने से पहले ही टूट जाएगा। वह साधु निर्दयी एवं क्रूर प्रवृत्ति का था।

राजा दुविधा में पड़ गए। वह तुंगभद्रा पर पुल बनवाना चाहते थे। पुल मजबूत एवं टिकाऊ होना चाहिए था। राजा ने रमन से परामर्श किया। रमन ने कहा कि एक टिकाऊ पुल के लिए मानव बलि आवश्यक है। उसका उत्तर सुनकर राजा का दुख दुगना हो गया।

राजा ने घोषणा की कि वह निर्दोष लोगों की बलि देकर पुल नहीं बनवाना चाहते। इस प्रकार भूत को प्रसन्न करना अविवेकपूर्ण है। परंतु रमन के पास एक अन्य विचार था। उसने सलाह दी कि पुल का निर्माण होना ही चाहिए, यह राष्ट्र की प्रगति के लिए आवश्यक है। मानव बलि देकर भूत को प्रसन्न किया जा सकता है, इसके भी तरीके हैं।

राजा उत्सुकतापूर्वक उन तरीकों के बारे में जानना चाहते थे। रमन ने स्पष्ट किया कि देश में अनेक अपराधी हैं जिन्हें मृत्युदंड की सजा सुनाई गई है। लोक कल्याण के लिए उनके प्राणों की बलि दी जानी चाहिए। अब से जिन स्थानों पर पुल बनाए जाने हैं, वहां इन अपराधियों की सजा कार्यान्वित की जाए। महाराज को इस संबंध में आवश्यक आदेश जारी करने चाहिए। इस प्रकार यह समस्या हल हो सकती है।

राजा ने राहत की सांस ली। वह उत्साहित हो गए। उन्होंने रमन को एक हजार स्वर्ण मुद्राएं पुरस्कार में देकर सम्मानित किया। राजा सदैव रमन पर उदार रहे। इसी कारण राज दरबार का यह विदूषक एक धनी व्यक्ति बन गया।

 

 

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