कुचिपुड़ी मंडली विजयनगर से लौट आई। रमन ने ही मंडली को समेटा था। राजा ने रमन को बुलाकर पूछताछ की। रमन अडिग रहा। ‘मैंने झूठ बोलने वालों को पीटा है।’
‘वह कृष्ण की कहानियाँ सुना रहा था, है ना?’ राजा ने पूछा। ‘यदि ऐसा है तो मैंने पाप किया है। आप मुझे दंड दीजिए। मैं स्वयं दंड सुनाता हूँ। एक खंभे से बाँधकर मुझे चौबीस कोड़े मारे जाएँ,’ रमन ने अनुरोध किया।
‘चौबीस कोड़े! क्या माँग रहे हो?’ राजा आश्चर्य से बोले। कुचिपुड़ी मंडली का कार्यक्रम इतना अच्छा नहीं था। ‘रमन के प्रहार ने ही उनका कार्यक्रम समाप्त किया। उसके लिए मैं तुम्हें दंड नहीं दूंगा। बल्कि तुम्हें पुरस्कृत किया जाएगा।’ उन्होंने कहा। ‘पुरस्कार हो या दंड, मुझे केवल चौबीस कोड़े चाहिए,’ रमन अड़ा रहा।
‘तुम चौबीस कोड़े क्यों माँगते हो?’ राजा उत्सुक हुए। ‘वह बाद में बताऊंगा। कृपया चौबीस कोड़े का वादा करें!’ रमन की माँग राजा ने स्वीकार कर ली।
सैनिक दंड देने आए। रमन के दोनों ओर दो सैनिक खड़े हो गए। ‘हे प्रभु, महल में प्रवेश का आपका जो पुरस्कार है, वह इन दोनों सैनिकों का भी हक है। मैंने अपना आधा पुरस्कार उन्हें देने का वादा किया था। पुरस्कार का वादा करने के बाद ही सैनिकों ने मुझे दरबार में प्रवेश दिया। इस प्रकार, आपके द्वारा वादा किए गए चौबीस कोड़े इन दोनों द्वारपालों में बराबर बाँटे जाएँ,’ रमन ने राजा से विनती की।
राजा अपने आदेशों की अवहेलना करने के लिए सैनिकों पर क्रोधित हो गए। वह लालची और भ्रष्ट सैनिकों को कठोर दंड देना चाहते थे। उन्होंने दोनों सैनिकों को पचास-पचास कोड़े लगाने का आदेश दिया। भ्रष्ट अधिकारियों का पता लगाने के लिए उन्होंने रमन को धन से पुरस्कृत किया।
एक अजीब बिल्ली – 27

एक बार विजयनगर में चूहों का आतंक फैला हुआ था। चूहों की संख्या बढ़ने से निश्चित रूप से अकाल और खाद्य संकट आता है। इस आतंक को समाप्त करने के लिए अधिकारियों ने बिल्लियाँ पालने का निर्णय लिया। राजा ने इस उद्देश्य से एक हजार बिल्लियाँ लाईं। उन्होंने प्रत्येक परिवार को एक बिल्ली दी। बिल्लियों को दूध देने के लिए धन भी दिया गया।
रमन भी एक बिल्ली लेकर घर पहुँचा। उसके अनुसार बिल्ली बिना दूध के भी जीवित रह सकती है। ‘यहाँ तो इंसान भी बिना दूध के पल जाते हैं। राजा द्वारा दिए गए धन से हम अपने बेटे को दूध दे सकते हैं,’ रमन ने अपनी पत्नी से कहा। ‘पर बिल्ली दूध चुराकर पी जाएगी,’ उसकी पत्नी को शंका हुई। रमन ने पत्नी को समझाया, ‘मैंने इसे रोकने का उपाय ढूंढ लिया है।’
रमन बिल्ली का बच्चा घर लाया। पर उसने उसे दूध की एक बूंद भी नहीं दी। उसने दूध को अच्छी तरह उबाला। बिल्ली के बच्चे के सामने गर्म दूध की एक कटोरी रख दी गई। बिल्ली ने उसे छुआ तक नहीं। वह गर्म दूध से निकलती भाप से डर गई। रमन ने जबरन बिल्ली के होंठ गर्म दूध में डुबोए। उसके होंठ जल गए।
यह एक निर्णायक मोड़ था। इसके बाद रमन की बिल्ली ने कभी दूध नहीं पिया। बिल्ली का बच्चा दूध देखकर छिपने लगा। इस प्रकार रमन ने अपनी बिल्ली को दूध से घृणा करने वाला जानवर बना दिया। उसने दूध अपने बेटे को पिलाया। एक पखवाड़ा बीत गया। राजा ने दरबार में सभी बिल्ली के बच्चों को प्रस्तुत करने का आदेश दिया।
सभी ने अपनी बिल्लियाँ दिखाईं। दूध पीकर वे सभी हृष्ट पुष्ट हो गई थीं। पर रमन की बिल्ली अकेली दुबली पतली रह गई।
‘अरे रमन, तेरी बिल्ली के बच्चे का क्या हुआ? क्या तू उसे दूध नहीं दे रहा?’ राजा ने पूछा। ‘हे प्रभु, जब इंसानों के पीने के लिए दूध की एक बूंद भी उपलब्ध नहीं है, तो बिल्ली को दूध पिलाने की किसे फिक्र होगी?’ रमन ने जवाब दिया। पर राजा क्रोधित हो गए। तो तुमने बिल्ली के बच्चे को दूध पिलाने के लिए दिया गया धन गबन कर लिया।
‘मैंने धन का दुरुपयोग नहीं किया है। मैंने उस धन से दूध खरीदा है। चूंकि मेरी बिल्ली ने दूध नहीं पिया, मैंने वह अपने बेटे को दे दिया,’ रमन ने कहा। पर राजा ने हार नहीं मानी। ‘क्या इस देश में कोई ऐसी बिल्ली है जो दूध नहीं पीती? तुम झूठ बोल रहे हो। यदि यह सिद्ध हो जाए कि तुम्हारी बिल्ली दूध नहीं पीती, तो मैं तुम्हें सौ स्वर्ण मुद्राएँ दूंगा। दूसरी ओर, यदि तुम्हारी बिल्ली दूध पी गई, तो तुम्हें सौ कोड़े लगेंगे! क्या तुम तैयार हो?’ राजा ने चुनौती दी। रमन सहमत हो गया।
एक सैनिक दूध की कटोरी लेकर बिल्ली के सामने रखने आया। वह तुरंत भाग गई। उसने दूध को सूंघा तक नहीं। इस प्रकार रमन ने यह प्रतियोगिता जीत ली। उसे सौ स्वर्ण मुद्राएँ पुरस्कार में दी गईं। बाद में रमन ने राजा को बताया कि कैसे उसने बिल्ली को दूध न पीने की शिक्षा दी। राजा रमन के साथ हँस पड़े। राजा ने रमन की चतुराई की प्रशंसा की।
रेत खाना – 28

राजा अपने लिए एक विशेष प्रकार की मिश्री तैयार करवाते थे। तैयारी के बाद उस मिश्री को सुखाकर संभालकर रखा जाता था। एक बार रमन ने महल में यह प्रक्रिया देखी। उसने राजा से पूछा, ‘यह क्या है?’ राजा ने रमन को मूर्ख बनाने की कोशिश करते हुए कहा, ‘यह रेत है।’ पर रमन को संदेह हुआ। ‘यह एक खास किस्म की रेत है,’ राजा ने स्पष्ट किया।
रमन ने कुछ नहीं कहा। राजा ने सोचा कि रमन उसकी बातों पर विश्वास कर गया है। राजा अपने कक्ष में गए और रानियों को यह घटना सुनाई। रानियाँ भी राजा के साथ हँस पड़ीं। उन सभी ने समझा कि राजा ने रमन को बेवकूफ बना दिया है।
रमन अपने घर गया। वह अपने बेटे के साथ वापस लौटा। दोनों ने सुखाने के लिए रखी मिश्री खानी शुरू कर दी। जब राजा हरम से लौटे तो उन्होंने रमन और उसके बेटे को मिश्री खाते देखा। ‘तुम क्या कर रहे हो?’ राजा ने पूछा।
‘हे प्रभु! हमारी प्यारी गाय मर गई है। अपने दुख की भरपाई के लिए हम रेत खा रहे हैं!’ दोनों मिश्री खाते रहे। राजा रमन की बातों से बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने बाकी बची मिश्री इकट्ठा करके सुरक्षित रखने का आदेश दिया। इसके बाद राजा ने कभी रमन को मूर्ख बनाने की कोशिश नहीं की।
फिर से मौत की सजा – 29

एक बार राजा कृष्णदेवराय ने एक नया महल बनवाया। उन्होंने एक कुशल चित्रकार को बुलाकर दीवारों पर चित्रकारी करवाई। राजा और रमन चित्रों को देखने लगे। उनमें सुंदर प्राकृतिक दृश्य थे। महल में राजकुमारियों के चित्र भी सजाए गए थे।
रमन एक सुंदर स्त्री के चित्र पर मोहित हो गया। वह बैठी हुई मुद्रा में एक स्त्री का पिछला दृश्य था। उसका सुडौल शरीर, लंबे और घुंघराले बाल सभी को आकर्षित कर रहे थे। पर इसमें एक गंभीर कमी थी। उस सुंदर स्त्री का चेहरा चित्रकार ने नहीं बनाया था।
‘इस स्त्री का सामने का दृश्य कहाँ है?’ रमन को शंका हुई। ‘चित्र में स्त्री का चेहरा है। हमें अपनी कल्पना शक्ति से इसे देखना चाहिए। क्या तुममें सौंदर्य बोध है?’ राजा ने रमन का उपहास किया। ‘मैं भी आश्रम में पढ़ते समय चित्र बनाया करता था। अब मैं एक महीने तक चित्रकारी सीखने जा रहा हूँ,’ रमन बोला। ‘यह अच्छी बात है,’ राजा ने कहा।
रमन एक महीने तक महल नहीं आया। एक महीने बाद वह महल आया। ‘मैं चित्रकारी सीखकर यहाँ आया हूँ,’ रमन ने कहा। ‘बहुत अच्छा। जैसा कि तुम जानते हो, हमारा नया ग्रीष्मकालीन महल तैयार है। वहाँ कोई चित्र नहीं हैं। तुम वहाँ एक चित्र बना सकते हो,’ राजा ने आदेश दिया। रमन ने सिर हिलाया और ग्रीष्मकालीन महल चला गया। उसने चित्र बनाने और रंग भरने शुरू किए। पर उसकी चित्रकारी विचित्र थी। शरीर के अंग जैसे आँखें, पैर और दाँत यहाँ वहाँ बिखरे हुए थे।
एक सप्ताह बाद रमन ने राजा को सूचित किया कि उसने अपना काम पूरा कर लिया है। राजा चित्र देखने गए। पर वह निराश हो गए। भवन की सुंदर दीवारें चित्रकारी से गंदी दिख रही थीं। राजा के लिए यह दुखद दृश्य था। उन्हें अगले दिन मेहमानों के साथ उसी महल में रहना था। ‘यह क्या है?’ राजा क्रोधित हो गए।
‘मैंने सुंदर रानी के पैर, हाथ आदि के चित्र बनाए हैं। उन्हें पूरा देखने के लिए आपमें कल्पना शक्ति होनी चाहिए,’ रमन ने मजाक किया। रमन ने सोचा कि राजा उसका जवाब सुनकर हँसेंगे। पर राजा आग बबूला हो गए और आदेश दिया, ‘इसे ले जाओ और सिर कलम कर दो।’
जल्लादों में झगड़ा – 30

जैसे ही राजा ने रमन को मारने का आदेश दिया, दो सैनिक तलवार लेकर आदेश पूरा करने आगे आए। वे जंगल की ओर चल पड़े। रमन दोनों सैनिकों के बीच चल रहा था। सैनिकों के मन में रमन के प्रति द्वेष था। इसलिए उसे मारने में उन्हें कोई हिचक नहीं थी। दूसरी ओर, रमन ने भी सैनिकों को चकमा देने की योजना बनाई थी।
उनका रास्ता तुंगभद्रा नदी के किनारे से होकर जा रहा था। रास्ते में रमन बोला, ‘मैं इस नदी में डुबकी लगाकर एक क्षण प्रार्थना करना चाहता हूँ।’ पर एक सैनिक को शंका हुई। ‘यदि नदी में डुबकी लगाकर तुम गायब हो गए, तो हम राजा को क्या बताएंगे?’ उसने कहा। ‘मैं तुम्हें राजा से कोई हानि नहीं पहुँचाऊंगा। मैं मरने के लिए तैयार हूँ। मेरे नदी में डुबकी लगाने के बाद, तुम दोनों मेरे पलायन को रोकने के लिए मेरे दोनों ओर खड़े हो जाना। यदि मैं प्रार्थना के बीच भागने का प्रयास करूं, तो तुम तलवार से मेरी गर्दन पर वार कर देना। इस तरह तुम राजा की सजा से बच सकते हो,’ रमन ने सैनिकों से कहा।
रमन आँखें बंद करके पानी में खड़ा हो गया। सैनिक उठी हुई तलवारों के साथ उसके पास खड़े थे। वे सब कुछ देर वहाँ खड़े रहे। अचानक रमन पानी के अंदर तैर गया। सैनिकों ने एक साथ दोनों ओर से अपनी तलवारें चला दीं। सैनिकों के सिर नदी में गिर गए। उनके शव पानी में बह गए।
पानी से बाहर आया रमन सैनिकों के मृत शरीरों को देखकर राजा से मिलने दरबार पहुँचा। राजा डर गए। ‘तुम बच निकले,’ वे बोले। ‘हे प्रभु! दीवारों से अधिक मूल्य मनुष्यों का है। आपके क्रोध के कारण दो जानें चली गईं।’ रमन ने राजा को बताया कि मृत्युदंड के प्रयास में क्या हुआ था। महल की दीवार पर रमन की गंदी चित्रकारी ने ही राजा को क्रोधित किया था।