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काँच का जंगल | The Glass Forest

परी कथाएँ

काँच का जंगल

एक शांत गाँव की सीमा से थोड़ी दूर एक रहस्यमय जंगल था जिसे लोग काँच का जंगल कहते थे। कोई भी वहाँ आसानी से नहीं जाता था क्योंकि कहा जाता था कि उस जंगल में हर पेड़, हर पत्ता, हर फूल, यहाँ तक कि मिट्टी भी चमचमाते काँच की बनी हुई थी। सुबह की धूप जब उस जंगल पर पड़ती तो पूरा जंगल इंद्रधनुष की तरह चमकता और लगता जैसे जमीन पर रंगों की कोई नदी बह रही हो। गाँव के बच्चे अक्सर दूर खड़े होकर उस चमक को निहारते, लेकिन वहाँ जाने की हिम्मत किसी में नहीं थी। गाँव की एक बच्ची, जिसका नाम नीहा था, हमेशा से उस जंगल को पास से देखना चाहती थी। उसे लगता था कि इतनी चमकदार जगह में कोई राज जरूर छिपा होगा। उसकी दादी अक्सर उसे समझातीं कि काँच का जंगल जितना सुंदर दिखता है, उतना ही नाजुक भी है। लेकिन नीहा की जिज्ञासा इतनी गहरी थी कि एक दिन उसने तय किया कि वह खुद जाकर देखेगी। वह सुबह जल्दी उठी, शांत रास्ते पर चलते हुए जंगल की ओर बढ़ी और कुछ ही देर में वह उस जगह पहुँच गई जहाँ से काँच का जंगल शुरू होता था।

जैसे ही उसने अंदर कदम रखा, उसके सामने जो दृश्य था, वह किसी जादुई दुनिया से कम नहीं था। पेड़ों की पतली काँच की शाखाएँ हवा में हल्की सी खनकतीं, जैसे कोई घंटी बज रही हो। पत्ते पारदर्शी थे और उन पर पड़ती रोशनी से जमीन पर रंगीन छायाएँ गिरती थीं। फूल काँच के बने हुए थे और धूप में चाँदी की तरह चमक रहे थे। नीहा इस सुंदरता में खो गई और भूल गई कि यहाँ हर चीज़ बहुत नाजुक है।

फिर भी उसकी जिज्ञासा उसे आगे ले जाती रही। वह सावधानी से कदम बढ़ाती हुई जंगल के बीचोंबीच पहुँची, जहाँ एक बड़ा सा झील जैसा हिस्सा था। वह झील भी काँच की थी। हवा चलती तो उसकी सतह में छोटे-छोटे कंपन उठते और वह किसी बड़ी घंटी की तरह अनोखी आवाजें पैदा करती। नीहा झील के पास बैठ गई और अपने पैर मोड़कर उस चमक को निहारने लगी। तभी उसे कुछ महसूस हुआ। झील के दूसरी तरफ कोई हल्के कदमों से उसकी ओर आ रहा था। वह कोई इंसान नहीं था। वह एक परी थी। उसके पंख भी काँच जैसे थे और हर पंख पर चमकीली रेखाएँ थीं जो रोशनी में चमक रही थीं। उसने नीहा को देखकर मुस्कुराते हुए कहा, “तुम यहाँ पहली बार आई हो।” उसकी आवाज इतनी कोमल थी कि नीहा को ऐसा लगा जैसे वह किसी काँच की घंटी की धुन सुन रही हो।

नीहा ने पूछा, “क्या यह जंगल आपका है?”

परी ने जवाब दिया, “यह जंगल उनका है जो इसे समझते हैं। यह स्थान सुंदर है, लेकिन उतना ही कोमल भी। यहाँ एक छोटी सी गलती भी किसी चीज़ को चोट पहुँचा सकती है।”

नीहा ने धीरे से कहा, “मैंने गलती से एक पत्ता तोड़ दिया।” वह थोड़ा शर्मिंदा थी।

परी पास आकर बोली, “गलतियाँ वही करते हैं जो सीखने की कोशिश करते हैं। लेकिन सबसे जरूरी बात यह है कि तुमने यह समझ लिया कि कोमल चीज़ों को संभालकर चलना चाहिए।”

नीहा ने जंगल के चारों ओर देखा। सभी चीजें इतनी नाजुक थीं कि उसे हर कदम सोच-समझकर रखना पड़ रहा था। उसने महसूस किया कि सिर्फ काँच का जंगल ही नहीं, बल्कि बहुत सारी चीजें, बहुत सारे लोग, बहुत सारी भावनाएँ भी ऐसी होती हैं जिन्हें संभालकर ही चलना चाहिए। वह उठी, जंगल में और गहराई तक गई, लेकिन अब उसके कदम पहले से हल्के थे, उसकी हर हरकत सोच-समझकर हो रही थी। उसे अब इस जगह की नाजुकता का एहसास हो चुका था।

शिक्षा: जीवन में बहुत सी चीज़ें कोमल होती हैं। उन्हें संभालकर चलना और उनकी कद्र करना जरूरी होता है।

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