गरीब दंपत्ति की किस्मत बदल देने वाला स्वर्ण कलश
एक समय की बात है, एक दूरस्थ गाँव में एक अत्यन्त निर्धन ब्राह्मण और उसकी पतिव्रता पत्नी रहते थे। दोनों का जीवन अभावों से घिरा हुआ था। ब्राह्मण प्रतिदिन भिक्षा माँगने निकलता, परंतु अधिकांश दिनों उसे इतना भी अन्न नहीं मिलता कि दोनों का पेट भर सके। कई दिन तो ऐसा होता कि सूरज ढल जाता, पर उनके हाथ में एक मुट्ठी अन्न भी न आ पाता।
जब भिक्षा कुछ अधिक न मिलती, ब्राह्मणी अपने झोंपड़े के बाहर उगे छोटे तम्मा के पौधे की पत्तियाँ तोड़कर उन्हें पानी में उबालती और उसी का हल्का सूप बनाकर पति को परोस देती ताकि उसका जीवन किसी प्रकार चलता रहे। वह स्वयं भी कई बार बिना भोजन के ही रात बिता देती, पर पति के प्रति उसका समर्पण अडिग था।
इसी प्रकार उनका जीवन चल रहा था कि एक दिन गाँव में बड़ा अद्भुत समाचार फैल गया। श्री गुरु नृसिंह सरस्वती उस दिन उसी निर्धन दंपत्ति की झोंपड़ी में पधारे। साधारण जन चकित हो उठे कि जहाँ दो समय का भोजन कठिनाई से मिलता है, वहाँ गुरुजी के लिए क्या व्यंजन बन पाएगा। किन्तु ब्राह्मणी ने अपने सरल स्वभाव और निर्मल हृदय से वही बनाया जो वह प्रतिदिन बनाती थी। उसने तम्मा की पत्तियों का साधारण-सा सूप गुरुजी के सम्मुख रख दिया।
गुरु नृसिंह सरस्वती ने उस सूप को पूर्ण तृप्ति और प्रसन्नता से ग्रहण किया। उनके नेत्रों में दंपत्ति की सादगी और निस्वार्थ सेवा के लिए करुणा और आशीष का भाव था। भोजन समाप्त कर उन्होंने दंपत्ति को धन्यवाद दिया और कहा कि अब उनके दुःखों का समय समाप्त होने वाला है। यह कहकर गुरुजी झोंपड़ी के बाहर आए, तम्मा के पौधे को जड़ से उखाड़ा और उसे एक ओर फेंककर वहाँ से चले गए।
यह दृश्य देखकर ब्राह्मण दंपत्ति आश्चर्य में पड़ गए। उनके मन में चिंता उठी कि यही छोटा-सा पौधा उनके कठिन दिनों में जीवन का आधार था। परंतु वे गुरु की महिमा जानते थे, अतः उन्होंने विश्वास रखा कि गुरुजी ने जो किया है, वह किसी कल्याण का सूचक अवश्य होगा।
कुछ देर बाद ब्राह्मण और उसकी पत्नी ने सोचा कि उस पौधे को पुनः लगा दिया जाए। वे उसी स्थान की मिट्टी खोदने लगे जहाँ तम्मा का पौधा उगा था। कहते हैं कि जैसे ही मिट्टी हटाई गई, नीचे एक बड़ा कलश प्रकट हुआ। कलश का ढक्कन उठाया तो देखा कि वह स्वर्ण मुद्राओं से भरा हुआ था। दंपत्ति के नेत्र आश्चर्य और आनंद से भर उठे।
उन्होंने उस अमूल्य कलश को अत्यंत सावधानी से उठाया और अपनी छोटी-सी झोंपड़ी में रख दिया। झोंपड़ी का द्वार बंद कर वे तुरंत गुरुजी के पास पहुँचे और घबराए हुए भाव से जो कुछ हुआ था, वह सब कह सुनाया। गुरु नृसिंह सरस्वती ने शांत स्वर में उन्हें समझाया कि यह सब प्रभु की कृपा और उनके द्वारा की गई सादगीपूर्ण सेवा का फल है। उन्होंने यह भी कहा कि स्वर्ण का उपयोग संयम से करें, धन के प्रकोप से बचें और कभी घमंड न करें।
उन्होंने चेतावनी दी कि यदि लोग अचानक उनके समृद्ध हो जाने का रहस्य जान गए तो ईर्ष्या और शंका उनके जीवन को संकट में डाल सकती है। अतः धन का व्यय संतुलित रखकर केवल आवश्यक कार्यों में करें और अपनी साधारणता को बनाए रखें।
ब्राह्मण दंपत्ति ने गुरु के उपदेश को अपने हृदय में बसा लिया। उन्होंने धन का उपयोग धर्म, दान और अपने सरल जीवन को सँवारने में किया। वे न तो व्यर्थ प्रदर्शन करते थे और न ही किसी को धन का गुमान दिखाते। समय बीतता गया और वे गुरु की कृपा और अपने विनम्र स्वभाव के कारण आजीवन सुख, संतोष और वैभव में रहे।
शिक्षा: सादगी और निस्वार्थ सेवा ही सच्चे आशीर्वाद का मार्ग खोलती है।