जादुई टेबल, गधा और लाठी
यह कहानी तीन भाइयों की है। बहुत समय पहले उत्तर भारत के एक छोटे से गाँव सनपुरा में तीन भाई रहते थे—हरिदास, मोहनदास और सबसे छोटा गोपीनाथ। तीनों स्वभाव से भले, मेहनती और एक-दूसरे से गहरा प्रेम करने वाले थे। बचपन से ही उनका परिवार आर्थिक तंगी से जूझता रहा था। पिता के गुज़रने के बाद सभी को लगा कि अब उन्हें अपनी किस्मत स्वयं बनानी होगी। इसलिए तीनों भाइयों ने तय किया कि वे अलग-अलग जगह जाकर कोई हुनर सीखेंगे और फिर कमाई करके घर लौटेंगे।
सबसे बड़ा भाई हरिदास शहर जाकर बढ़ई का काम सीखने लगा। उसकी मेहनत और निष्ठा देखकर उसके गुरु बहुत खुश हुए। प्रशिक्षण पूरा होने पर गुरु ने उसे विदाई में एक साधारण-सी दिखने वाली लकड़ी की मेज़ दी। लेकिन वह मेज़ साधारण नहीं थी। गुरु ने मुस्कुराते हुए कहा, “इसे ज़मीन पर रखकर बस बोलना—‘मेज़ जी, भोजन परोस दो।’ यह मेज़ तुरंत तरह-तरह के स्वादिष्ट पकवान सामने रख देगी।” हरिदास यह सुनकर फूला न समाया। अब उसे लगा कि घर लौटकर वह अपने भाइयों और गाँव वालों की भूख मिटा सकेगा।
गाँव लौटते समय वह एक सराय में रुका, जिसका मालिक था एक लालची बूढ़ा आदमी, भोलाराम। रात को भोलाराम ने सुना कि मेज़ जादुई है। उसकी लालच जाग उठी। जैसे ही हरिदास गहरी नींद में सोया, भोलाराम ने जादुई मेज़ की जगह बिल्कुल वैसी ही दिखने वाली एक साधारण मेज़ रख दी। अगली सुबह हरिदास बिना कुछ जाने गाँव की ओर रवाना हो गया।
सनपुरा लौटकर उसने उत्साह में पूरे गाँव को बुलाया और सबके सामने घोषणा की कि वह एक जादुई मेज़ लाया है जो भोजन परोसती है। सब इकट्ठे हुए। हरिदास ने मेज़ रखी और बोला—“मेज़ जी, भोजन परोस दो!” पर मेज़ चुपचाप पड़ी रही। लोग हँसने लगे, कुछ ने चुटकी ली, “हरिदास शहर जाकर मज़ाक सीख आया है।” हरिदास शर्म से गड़ गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसके साथ क्या हुआ।
इस बीच, दूसरे भाई मोहनदास ने दक्षिण के एक आश्रम में पशुपालन का काम सीखा था। काम पूरा होने पर वहाँ के महंत ने उसे एक अजीब-सा दिखने वाला गधा दिया और कहा, “यह साधारण गधा नहीं है। इसके मुँह के पास जाकर बस कहना—‘हीरा-मोती निकालो!’ और यह सोने के सिक्के गिराएगा। इसका ख्याल रखना।” मोहनदास के मन में आशा की एक किरण जगी। यह गधा परिवार का भविष्य बदल सकता था।
वापसी में उसे भी वही भोलाराम की सराय मिली। वहाँ ठहरते समय उसने अनजाने में भोलाराम को गधे का राज बता दिया। रात होते ही भोलाराम एक बोरी लेकर आया और असली जादुई गधे की जगह एक बिल्कुल वैसा ही साधारण गधा रख गया। अगले दिन मोहनदास साधारण गधे को लेकर गाँव पहुँचा। उसने गर्व से सबको बुलाया और कहा कि वह गधा सोना निकालता है। पर जब उसने कहा—“हीरा-मोती निकालो!”, तो गधा हिनहिनाने लगा। लोग फिर हँसे। दोनों भाइयों का मज़ाक बन गया। मोहनदास भी शर्म से भर गया और चुपचाप अपने कमरे में जा बैठा।
अब बारी थी तीसरे भाई गोपीनाथ की, जो खोज-यात्रा पर उत्तर के पहाड़ों में गया था। उसने वहाँ एक तपस्वी से युद्धकला और बुद्धिमानी की शिक्षा ली। तपस्वी ने विदाई में उसे एक साधारण-सा डंडा दिया और कहा, “यह डंडा तब तक साधारण है जब तक तुम इसे आदेश न दो। बस कहना—‘डंडे, अपना काम कर!’ और यह गलत करने वालों को अपने आप सबक सिखा देगा। इसे हमेशा न्याय के लिए इस्तेमाल करना।”
गोपीनाथ जब गांव लौटा, तो उसने दोनों भाइयों की आपबीती सुनी। उसे तुरंत समझ आया कि यह सब भोलाराम का खेल है। वह बिना देर किए उसी सराय पर पहुँचा और रात में ठहरने की इच्छा जताई। जैसे ही भोलाराम उसके डंडे को चुराने आया, गोपीनाथ ने धीरे से कहा—“डंडे, अपना काम कर!” अगले ही क्षण डंडा हवा में उठा और भोलाराम को धड़ाधड़ मारने लगा। घबराकर भोलाराम चिल्लाने लगा, “बस करो! मैं सब लौटा दूँगा! वो जादुई मेज़ भी, वो जादुई गधा भी!”
गोपीनाथ ने डंडे को रुकने को कहा और भोलाराम से दोनों सामान वापस लेकर गाँव लौट आया। हरिदास की मेज़ फिर स्वादिष्ट भोजन परोसने लगी। मोहनदास का गधा फिर से सोने के सिक्के देने लगा। तीनों भाइयों की किस्मत बदल गई और गाँव के लोग भी उनका सम्मान करने लगे। तीनों भाइयों ने अपनी संपत्ति का उपयोग गाँव की भलाई में किया—भोजनशाला बनाई, स्कूल बनवाया और ज़रूरतमंदों की मदद की।
इस तरह बुद्धि, साहस और न्याय के बल पर तीनों भाइयों का जीवन बदल गया और सनपुरा गाँव खुशहाली से भर गया।