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दूधवाली और उसकी मटकी

नैतिक कहानियाँ

एक ग्वालिन थी जिसका नाम पारो था। एक दिन उसने अपनी गाय का दूध निकाला और दो बाल्टी भरकर ताजा दूध लेकर बाजार चल दी। उसने दोनों बाल्टियों को एक डंडे पर लटकाया और बेचने के लिए रवाना हुई। बाजार जाते हुए उसके मन में धन के ख्याल आने लगे। वह सोचने लगी कि दूध बेचकर जो पैसे मिलेंगे, उससे वह क्या क्या करेगी।

वह खुद से बातें करते हुए बोली, “पैसे मिलते ही मैं एक मुर्गी खरीदूंगी। मुर्गी अंडे देगी और उन अंडों से मुझे और मुर्गियाँ मिल जाएंगी। वे सब अंडे देंगी और मैं उन्हें बेचकर और पैसे कमाऊंगी। फिर मैं पहाड़ी पर बने उस बड़े घर को खरीद लूंगी। सब लोग मुझसे ईर्ष्या करेंगे।” इन सुखद सपनों में खोई वह आगे बढ़ रही थी। तभी अचानक उसका पैर फिसला और वह गिर पड़ी। दोनों बाल्टियाँ नीचे गिर गईं और सारा दूध जमीन पर बह गया। उसके सारे सपने चूर चूर हो गए। पारो वहीं बैठकर रोने लगी और बेवकूफों की तरह बार बार कहने लगी कि अब उसका सपना पूरा नहीं होगा।

कहानी की सीख
इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि जो चीज अभी हासिल नहीं हुई है, उसके बारे में पहले से योजना बनाना और गिनती करना उचित नहीं है। भविष्य के सपनों में खोकर वर्तमान को नष्ट नहीं करना चाहिए।

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