एक समय की बात है, एक चूहा और एक मेंढक गहरे मित्र थे। हर सुबह मेंढक तालाब से निकलकर पेड़ के छेद में रहने वाले चूहे से मिलने आता। वह उसके साथ समय बिताकर वापस अपने घर चला जाता। एक दिन मेंढक ने सोचा कि वह हमेशा चूहे से मिलने खुद ही क्यों आए? चूहा तो कभी उसके तालाब पर मिलने नहीं आता। यह सोचकर उसका मन भर आया और उसने चूहे को जबरदस्ती अपने साथ तालाब ले जाने का निश्चय किया।
एक दिन जब चूहा ध्यान नहीं दे रहा था, मेंढक ने एक डोरी चूहे की पूँछ से बाँध दी और दूसरा सिरा अपने पैर से। फिर वह तालाब की ओर उछलने लगा। बेचारा चूहा घसीटा जाने लगा। मेंढक पानी में कूद गया। पर जब उसने पीछे मुड़कर देखा तो चूहा डूब रहा था और सांस लेने के लिए तड़प रहा था। मेंढक ने तुरंत डोरी खोली और चूहे को किनारे ले आया। आँखें मूंदे हुए चूहे को देखकर मेंढक को बहुत दुख हुआ। उसे अपने किए पर तुरंत पछतावा होने लगा।
इस कहानी की सीख यह है कि बदले की भावना से किया गया काम हमेशा नुकसानदायक होता है। मित्रता में समझदारी और त्याग की आवश्यकता होती है।