ईमानदार शिष्य
श्री गुरु नरसिंह सरस्वती प्रायः एक किसान शिष्य के खेत के पास से गुज़रते थे। शिष्य गुरु के प्रति अगाध श्रद्धा रखता था। जब भी गुरुजी उधर से निकलते, वह श्रद्धा से सिर झुकाकर उनके चरणों में गिर पड़ता। यह दृश्य नित्य का हो गया था। एक दिन गुरुजी ने उसकी इस अटूट भक्ति से प्रभावित होकर उसे पास बुलाया और पूछा, “बेटा, तुम हमेशा हमारे चरणों में ऐसे गिर पड़ते हो। क्या तुम सचमुच हमारे प्रति इतने समर्पित हो कि हम जो भी कहेंगे, वह बिना किसी प्रश्न के करोगे?” शिष्य ने विनम्रतापूर्वक सिर झुकाते हुए उत्तर दिया, “गुरुजी, आप मेरे आध्यात्मिक मार्गदर्शक हैं। मैं हमेशा आपकी आज्ञा का पालन करूँगा, चाहे वह कुछ भी हो। यह मेरा व्रत है।”
गुरुजी ने शिष्य के चेहरे पर अटूट विश्वास देखा। तभी उनकी दृष्टि शिष्य के खेत पर पड़ी। खेत में मक्का की फसल लहलहा रही थी। हरे-हरे पौधे हवा में हिल रहे थे, पर उन पर लगे भुट्टे अभी छोटे और कच्चे थे, पूरी तरह पकने में अभी समय था। गुरु नरसिंह सरस्वती ने शिष्य की परीक्षा लेने का निश्चय किया। उन्होंने शिष्य की ओर देखकर आदेश दिया, “यदि तुम सचमुच हमारी आज्ञा मानते हो, तो जाओ और अपनी यह सारी फसल अभी, इसी समय काट दो।”
यह आदेश सुनकर सामान्य व्यक्ति तो तर्क-वितर्क करता, पर शिष्य के चेहरे पर एक क्षण के लिए भी संदेह की छाया नहीं आई। उसने तुरंत गुरु के चरणों को प्रणाम किया और बोला, “जैसी आज्ञा।” वह सीधे अपने घर पहुँचा और अपनी पत्नी से कहा कि वह अभी खेत जा रहा है और पूरी फसल काट देगा। पत्नी चौंक उठी। उसने कहा, “स्वामी, यह कैसा निर्णय है? फसल तो अभी कच्ची है। उसे पकने में अभी सप्ताह लगेंगे। अभी काटोगे तो कुछ भी नहीं मिलेगा।” पर शिष्य अडिग था। उसने कहा, “गुरु की आज्ञा शिरोधार्य है। मैं उनके शब्द पर संदेह नहीं कर सकता।”
पत्नी बहुत चिंतित हुई। उसने सोचा कि शायद पति को कुछ समझ नहीं आ रहा। वह चुपचाप खेत के मालिक के पास गई, जिससे उन्होंने खेत बटाई पर लिया था। उसने सारी स्थिति समझाई। खेत का मालिक भी हैरान हुआ। उसने शिष्य को बुलाया और पूछा, “तुम यह क्या करना चाहते हो? अगर तुम अभी कच्ची फसल काटोगे तो नुकसान ही होगा।” शिष्य ने विनम्रतापूर्वक गुरु आज्ञा बताई। खेत के मालिक ने एक उपाय सोचा। उसने शिष्य से एक लिखित समझौता करवाया, जिसमें शिष्य ने वचन दिया कि मौसम के अंत में, यदि उसे कोई फसल मिलती है, तो वह उसका दो हिस्सा खेत के मालिक को देगा। इस समझौते के बाद, मालिक ने उसे अनुमति दे दी।
शिष्य ने बिना देर किए, गुरु के आदेश का पालन करते हुए पूरी अधपकी फसल काट डाली। पड़ोसी किसान उसकी इस मूर्खता पर सिर हिलाते रहे। पर कुछ ही दिनों बाद, अचानक भारी मूसलाधार बारिश शुरू हो गई। लगातार कई दिनों तक हुई इस वर्षा ने खेतों में पानी भर दिया। जिन किसानों ने अपनी फसल नहीं काटी थी, उनकी पूरी लहलहाती फसल सड़कर बर्बाद हो गई। सबका साल भर का परिश्रम नष्ट हो गया। पर शिष्य, जिसने गुरु की बात मानकर समय से फसल काट ली थी, सुरक्षित था। उसने अपने कच्चे भुट्टों को सुरक्षित स्थान पर सुखाया और संग्रहित किया। आश्चर्य यह हुआ कि बाद में उसकी इस फसल से प्राप्त दाने, एक पूरी तरह पकी फसल से प्राप्त दानों से दस गुना अधिक निकले! यह एक चमत्कार ही था।
अब शिष्य के पास फसल के दस हिस्से थे। उसने वचन के अनुसार दो हिस्से खेत के मालिक को दे दिए। दो हिस्से उसने अपने परिवार के लिए बेचने के लिए अलग रखे। और शेष छह हिस्से वह उन पड़ोसी किसानों में बाँटने चला गया, जिनकी फसल बारिश में नष्ट हो गई थी। उसने कहा, “यह मेरे गुरु की कृपा है, इसे आप सब भोगो।”
कुछ दिन बाद, जब श्री गुरु नरसिंह सरस्वती फिर उस रास्ते से गुज़रे, तो शिष्य उनके पास दौड़ा आया। वह गुरु के चरणों में गिरा और सारी घटना कह सुनाने ही वाला था कि गुरुजी ने मुस्कुराते हुए उसका हाथ थाम लिया। उन्होंने कहा, “बेटा, हमें सब कुछ पता है। हमने तुम्हें फसल के दस हिस्से केवल इसलिए दिए थे क्योंकि हम तुम्हारे हृदय को जानते थे। हम जानते थे कि तुम में से आठ हिस्से दूसरों की सेवा में दे दोगे और केवल दो हिस्से ही अपने लिए रखोगे। तुम्हारी निष्ठा, आज्ञापालन और निस्वार्थ भावना ने ही इस चमत्कार को संभव बनाया।”
शिक्षा: यह कहानी गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण, निःसंदेह आज्ञापालन और निस्वार्थ सेवा के महत्व को उजागर करती है। शिष्य ने बिना तर्क किए, बिना भविष्य की चिंता किए, गुरु के प्रत्येक शब्द को शिरोधार्य माना, भले ही वह बाहरी दृष्टि से अविवेकपूर्ण प्रतीत हो रहा था।