The Softly Speaking Waves of the River

नदी की धीमी बोलती लहरें – The Softly Speaking Waves of the River

सोने से पहले की कहानियाँ

नदी की धीमी बोलती लहरें

शांतपुर नाम के छोटे, सुंदर और हरे-भरे कस्बे में एक दस साल का लड़का रहता था, जिसका नाम था पार्थ। पार्थ को हमेशा से प्रकृति के करीब रहना अच्छा लगता था। दूसरे बच्चे मोबाइल में गेम खेलते या टीवी देखते रहते, लेकिन पार्थ का मन नदी, पेड़, मिट्टी और हवा में ज्यादा लगता था। उसके घर से थोड़ी ही दूरी पर बहती थी चमकीली शांतपुर नदी, जिसकी लहरें हर शाम सूरज ढलते ही सुनहरी हो जातीं। पार्थ रोज़ स्कूल के बाद नदी के किनारे जाता, वहाँ बैठकर पानी की आवाज़ सुनता, कंकड़ फेंकता और कभी-कभी पानी से बातें करने की कोशिश भी करता। उसे लगता था कि नदी में एक जादुई एहसास है, जैसे वह किसी पुराने दोस्त की तरह उसे समझती है।

एक शाम उसके साथ उसकी दो सबसे अच्छी दोस्त भी थीं—अनुष्का और रोहन। तीनों अक्सर साथ मिलकर नदी किनारे खेलते थे। उस दिन तेज़ हवाएँ चल रही थीं और आसमान में छोटे-छोटे बादल थे, जो कभी चाँद को ढक लेते और कभी चाँद की रोशनी पानी पर चमक जाती। पार्थ ने अचानक महसूस किया कि आज नदी की लहरें पहले जैसी नहीं हैं। पानी का बहाव थोड़ा धीमा था और लहरों में एक अजीब-सा भारीपन था। अनुष्का ने अपनी आँखें सिकोड़ कर पानी को देखा और बोली कि आज नदी की चमक भी कुछ फीकी दिख रही है। रोहन बोला कि शायद ठंड की वजह से पानी सुस्त हो गया हो, लेकिन पार्थ को अच्छा नहीं लग रहा था। उसने चुप होकर पानी के बहाव को सुना और उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे लहरें कह रही हों, “मुझे दर्द हो रहा है।”

पार्थ ने अनुष्का और रोहन को बताया कि नदी बोल रही है, मगर वे दोनों पहले तो हँस पड़े। लेकिन कुछ मिनट बाद दोनों को भी महसूस हुआ कि हवा में कोई अजीब-सी बेचैनी है। आसपास के पेड़ भी थोड़े झुके-झुके लग रहे थे, जैसे वे भी किसी परेशानी में हों। तभी अचानक ऊपर से कुछ गिरने की आवाज़ आई और तीनों ने डरकर ऊपर देखा। एक रंग-बिरंगा तोता उनके ऊपर वाली डाल से नीचे आ बैठा और बोला, “मैंने भी सुना है नदी की आवाज़।” तीनों बच्चे चौंक पड़े। यह तोता कोई साधारण तोता नहीं था। उसका नाम था पन्नालाल, और वह पूरे शांतपुर का सबसे अनोखा तोता था क्योंकि वह इंसानी भाषा भी समझ लेता था और कभी-कभी बोल भी लेता था।

पन्नालाल बोला, “आज नदी सच में परेशान है। रात में जंगल के कई जानवर भी बेचैन महसूस कर रहे थे। कुछ नीचे पानी के भीतर जरूर फंसा हुआ है।” पार्थ, अनुष्का और रोहन ने एक-दूसरे की तरफ देखा। अनुष्का बोली, “हमें नदी की मदद करनी चाहिए। यह नदी हमारी अपनी है।” रोहन ने सिर हिलाया, “बिल्कुल। अगर नदी को दर्द हो रहा है तो हम चुप नहीं बैठ सकते।”

अगली रात तीनों बच्चे टॉर्च, रस्सी, कपड़े बदलने और कुछ खाने का सामान लेकर नदी किनारे पहुँचे। वहाँ का माहौल शांत था, लेकिन हवा में अजीब-सा भारीपन था। चाँद आधा निकला हुआ था और उसकी रोशनी पानी पर हल्की-सी सिल्वर लाइन बना रही थी। पार्थ ने पानी में झुककर देखा तो लहरें धीमी-सी थीं, जैसे किसी ने उनकी ताकत छीन ली हो। तभी झाड़ियों से सरसराहट की आवाज़ आई और तीनों बच्चे डरकर पीछे हटे। लेकिन डरने की जरूरत नहीं थी—वहाँ जंगल की एक छोटी-सी हिरनी, जिसका नाम लाली था, खड़ी थी। लाली कांप रही थी। पन्नालाल तोता उड़कर पास की डाल पर बैठ गया और बोला, “लाली भी परेशान है। रात भर सो नहीं पाई। इसे नदी में कुछ अजीब लगा है।”

पार्थ ने नीचे घुटनों के बल बैठकर नदी का पानी छूकर देखा। पानी सामान्य से ठंडा था और उसके बहाव में अजीब-सा कंपन था। जैसे नदी कह रही हो कि वह किसी चीज़ को सह रही है। तभी पानी में हल्की-सी लहर उठी और एक छोटा-सा पानी में रहने वाला जानवर, जिसे बच्चे मोती कहा करते थे, पानी से बाहर आया। मोती एक छोटा ऊदबिलाव था, जो बहुत तेज़ तैरता था और हमेशा बच्चों के साथ खेलता था। मोती ने पंजों से इशारा किया कि उसे उनके साथ कुछ जरूरी बात करनी है। बच्चों ने उसे ध्यान से देखा। मोती ने पानी की ओर इशारा किया और फिर नीचे गोता लगाया। कुछ देर बाद वह ऊपर आया और एक छोटा पत्थर लाकर किनारे पर रखा। उस पत्थर पर काई जमी थी और वह नदी के बीच वाले हिस्से से आया था।

मोती ने इशारों में बताया कि नदी के बीच में कोई बहुत बड़ा, भारी-सा लठ्ठा या पत्थर फँसा हुआ है, जिसके कारण पानी का रास्ता रुक गया है। पार्थ ने टॉर्च की रोशनी से पानी के नीचे झांकने की कोशिश की, लेकिन गहराई बहुत थी। अनुष्का बोली, “अगर मोती अकेले नहीं खींच सकता, हमें मदद करनी होगी।” रोहन ने रस्सी खोलकर कहा, “हम तीन लोग मिलकर शायद कर सकें।”

पन्नालाल तोते ने एक बड़ी डाल पकड़कर जोर से हिलाया ताकि वहाँ चिपके ग्लो-वर्म्स यानी चमकने वाले कीड़े उड़कर नदी के ऊपर रोशनी फैला दें। अचानक नदी पर हल्की-सी प्राकृतिक चमक छा गई और पानी थोड़ा साफ दिखने लगा। बच्चों ने एक साथ रस्सी पानी के भीतर नीचे की। मोती नीचे जाकर रस्सी को उस भारी चीज़ के चारों ओर लपेटने लगा। कुछ मिनट बाद मोती पानी से बाहर आया और उसने सिर हिलाकर संकेत दिया कि रस्सी ठीक से बंध गई है।

अब असली मुश्किल शुरू हुई। तीनों बच्चों ने पूरी ताकत से रस्सी खींचनी शुरू की। अनुष्का के हाथ काँप रहे थे, रोहन के पैरों में खिंचाव हो रहा था और पार्थ का चेहरा लाल हो चुका था। मोती भी पानी में धक्का दे रहा था। हिरनी लाली घबराकर इधर-उधर चल रही थी, जैसे वह भी मदद करना चाहती हो। पन्नालाल तोता ऊपर उड़कर कह रहा था, “हिम्मत मत हारो।”

कुछ मिनटों के बाद रस्सी ज़ोर से खिंची और पानी उफनकर ऊपर आया। ऐसा लगा जैसे नदी खुद भी उनकी मदद कर रही हो। आखिरकार रस्सी के दूसरे सिरे पर एक विशाल लकड़ी का लठ्ठा दिखाई दिया, जिस पर कई परत काई की लगी थी और जो नदी के बीच एक बड़े पत्थर के साथ फंसा हुआ था। जैसे ही यह लठ्ठा बाहर आया, पानी का दबाव हल्का हो गया। नदी की लहरों में एकदम से नई ताकत आ गई। लहरें चमकने लगीं जैसे उन्हें फिर से नया जीवन मिल गया हो।

पानी अब साफ-सुथरा और तेज़ बहने लगा। हवा में हल्की-सी ताजगी फैल गई। मोती खुशी से पानी में गोता लगाने लगा। हिरनी लाली नदी किनारे उछलने लगी। पन्नालाल तोता अपने पंख फैलाकर बोला, “नदी ने कह दिया है—अब दर्द नहीं।” पार्थ, अनुष्का और रोहन ने एक-दूसरे को देखकर मुस्कुराए। उन्हें समझ आ गया था कि आज की रात में उन्होंने कुछ सच में बड़ा और अच्छा काम किया था।

अचानक आसमान में बादल हटे और चाँद की रोशनी इतनी चमकी कि पूरा पानी चाँदी जैसा लगने लगा। लहरें धीरे-धीरे किनारे से टकराकर संगीत जैसी आवाज़ पैदा कर रही थीं। पार्थ ने आँखें बंद करके महसूस किया कि नदी अब शांत है, खुश है और उनके साथ है। उसने मन ही मन कहा, “धन्यवाद नदी।”

उस रात तीनों बच्चे, मोती ऊदबिलाव, हिरनी लाली और पन्नालाल तोता नदी किनारे देर तक बैठे रहे। उन्हें ऐसा लगता था जैसे वे किसी परिवार का हिस्सा हों। जैसे इंसान, जानवर और नदी सब एक-दूसरे की भावनाएँ समझते हों। उस रात की दोस्ती, उस रात की मेहनत और उस रात की बहादुरी बच्चों की यादों में हमेशा के लिए बस गई।

श‍िक्षा: दूसरों की बात सुनना और उनकी परेशानी समझना एक बड़ी कला है।

 

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