1. मूर्ख साधु

एक गाँव में देव शर्मा नाम का एक बहुत ही प्रतिष्ठित और ज्ञानी साधु रहता था। सारा गाँव उसका बहुत आदर करता था। लोग अपनी मन्नतें पूरी होने पर या धर्म के नाम पर उसे तरह-तरह के कीमती उपहार दिया करते थे। साधु इन उपहारों को बेचकर बहुत सारा धन एकत्र कर लेता था। उसे किसी पर भरोसा नहीं था, इसलिए वह सारा धन एक मजबूत थैली में भरकर हमेशा अपने शरीर से बाँधकर रखता, चाहे सोते समय हो या जागते समय। उसकी इस आदत के कारण कोई भी चोर उसका पैसा चुराने का मौका नहीं पा रहा था।
गाँव में ही एक धूर्त चोर था जो साधु की इस थैली पर नजर गड़ाए बैठा था। वह हर तरह से उसे चुराने का उपाय सोचता रहता, पर साधु की सतर्कता के आगे उसकी एक न चलती। आखिरकार चोर ने एक चालाक योजना बनाई। उसने साधु के पास जाकर एक सीधे-सादे और जिज्ञासु शिष्य का भेष धारण किया। उसने साधु से धार्मिक शिक्षा पाने की इच्छा जताई। साधु, जो अपना ज्ञान बाँटने में विश्वास रखता था, खुशी-खुशी उसे अपना शिष्य बनाने को तैयार हो गया।
चोर ने पूरी लगन से साधु की सेवा शुरू कर दी। वह मंदिर की सफाई करता, साधु के लिए भोजन तैयार करता और हर छोटे-बड़े काम में उसकी मदद करता। धीरे-धीरे वह साधु का विश्वासपात्र बन गया। साधु भी उस पर पूरा भरोसा करने लगा। कई महीने इसी तरह बीत गए। एक दिन पास के ही एक गाँव के लोगों ने साधु को एक धार्मिक अनुष्ठान करने के लिए बुलाया। साधु अपने इसी नए “शिष्य” को साथ लेकर चल पड़ा। रास्ते में एक विशाल नदी पड़ी। नदी का ठंडा और निर्मल पानी देखकर साधु ने स्नान करने का मन बनाया। उसने अपने शरीर से बँधी पैसों की थैली को एक कपड़े में लपेटा और नदी के किनारे एक पत्थर के पास रख दिया। शिष्य से कहा, “बेटा, मैं नहाने जा रहा हूँ। तुम इस थैली की रखवाली करना। इसमें मेरे जीवन भर की कमाई है।”
चोर के लिए यही तो वह सुनहरा मौका था, जिसका वह इतने दिनों से इंतजार कर रहा था। जैसे ही साधु नदी के गहरे पानी में उतरा, चोर ने वह थैली उठाई और जंगल की ओर तेजी से भाग खड़ा हुआ। साधु जब नहा-धोकर वापस आया तो थैली और शिष्य दोनों गायब थे। उसकी सारी बचत और साथ ही उसका भोला भरोसा, दोनों धूल में मिल गए थे। वह पछतावे और शोक में डूब गया, पर अब पश्चाताप से कोई फायदा नहीं था।
शिक्षा: अजनबियों पर आसानी से और बिना जाँच-परख के विश्वास करना मूर्खता है। बुद्धिमान व्यक्ति को हर किसी पर तुरंत भरोसा नहीं करना चाहिए।
2. मूर्ख पंडित

एक गाँव में सोमेश्वर नाम का एक पंडित रहता था। वह माँ दुर्गा का परम भक्त था। एक बार उसके गुरु ने उसे आदेश दिया कि वह माँ दुर्गा की विशेष कृपा पाने के लिए कठिन तपस्या करे। गुरु की आज्ञा मानकर सोमेश्वर घने जंगल में चला गया। वहाँ उसने एक छोटी सी कुटिया बनाई और माँ दुर्गा की आराधना में लीन हो गया। वह दिन-रात एक ही ध्यान में मग्न रहता – माँ को प्रसन्न करना। उसने अपने तप की तीव्रता इतनी बढ़ा दी कि वह चिलचिलाती धूप, तूफानी बारिश और ठंड की कड़कड़ाती रातों में भी अपनी साधना से विचलित नहीं हुआ। वर्षों इसी तरह बीत गए। उसका शरीर दुर्बल हो गया, केवल भक्ति का ज्वार उसमें प्राण भर रहा था।
अंततः माँ दुर्गा उसकी अटूट भक्ति और कठिन तपस्या से प्रसन्न हुईं और एक दिन प्रकट हो गईं। उनकी अलौकिक ज्योति से पूरा जंगल प्रकाशित हो उठा। माँ ने कहा, “वत्स! मैं तुम्हारी भक्ति से अत्यंत प्रसन्न हूँ। वरदान माँगो, जो चाहो मैं तुम्हें दूंगी।” पंडित सोमेश्वर अवाक् रह गया। उसे अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ। उसने सोचा, “मैंने इतने वर्षों की साधना सफल कर ली। अब मैं ऐसा वरदान माँगूंगा जिससे मेरा नाम सारे संसार में फैल जाए।” उसने माँ से कहा, “हे माँ! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो मुझे संजीवनी बूटी प्रदान करें, जिससे मैं मृत प्राणियों को भी जीवित कर सकूं।”
माँ दुर्गा ने एक दिव्य पौधा उसे प्रदान किया और कहा, “इसकी कुछ बूंदें किसी मृत प्राणी पर डालो और वह तुरंत जीवित हो उठेगा।” इतना कहकर माँ अंतर्ध्यान हो गईं। पंडित बूटी लेकर बहुत खुश हुआ। वह अपने गाँव लौटने लगा। रास्ते में उसके मन में विचार आने लगे। “क्या सचमुच यह बूटी काम करेगी? कहीं माँ ने मेरी परीक्षा तो नहीं ली? मुझे पहले इसकी जाँच कर लेनी चाहिए।” वह डर और अविश्वास से भर गया। यह सोचकर कि यदि बूटी असली निकली तो गाँव वालों के सामने उसकी बड़ी बदनामी होगी, उसने एक मरे हुए शेर को बूटी आजमाने के लिए चुना।
उसने सोचा, “शेर तो पहले से मरा हुआ है। अगर बूटी काम करेगी तो वह जीवित हो जाएगा और अगर नहीं करेगी तो कोई नुकसान तो है नहीं।” उसने बूटी की कुछ बूंदें शेर के शरीर पर छिड़क दीं। कुछ ही पलों में एक चमत्कार हुआ। शेर के शरीर में हलचल हुई, उसकी आँखें खुल गईं और वह उठ बैठा। पंडित खुशी से झूम उठा कि उसका वरदान सच साबित हुआ। परन्तु अगले ही पल शेर ने जोरदार दहाड़ लगाई। यह दहाड़ उसकी प्राकृतिक स्वभाव और भूख की घोषणा थी। पंडित की खुशी भय में बदल गई। उसे अपनी भूल का अहसास हुआ, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। पुनर्जीवित शेर ने उस पर छलांग लगा दी और क्षण भर में ही उस मूर्ख पंडित को अपना भोजन बना लिया। इस प्रकार एक लालची और अविवेकी निर्णय ने उसकी जीवन लीला समाप्त कर दी।
शिक्षा: लालच और अविवेक से लिया गया कोई भी निर्णय विनाशकारी हो सकता है। बुद्धिमान व्यक्ति को किसी भी कार्य के परिणामों को पहले ही सोच-विचार लेना चाहिए।
3. लोहे का तराजू चुराने वाले चूहे

एक गाँव में दिलीप नाम का एक युवक रहता था। उसके पास पैसे तो कम थे, पर हिम्मत और बुद्धिमत्ता काफी थी। एक दिन उसने विदेश जाकर धन कमाने का निश्चय किया। पर यात्रा के लिए उसके पास पूंजी नहीं थी। उसके पास एक भारी लोहे का तराजू था, जो उसके पिता की यादगार था और बहुत मजबूत बना हुआ था। दिलीप ने एक धनिक महाजन के पास जाकर यह तराजू गिरवी रख दिया और कुछ रुपए उधार लिए। उसने महाजन से कहा, “मैं विदेश से कमाई करके लौटते ही यह रुपए चुका दूंगा और अपना तराजू वापस ले लूंगा।” महाजन ने हामी भर दी।
दिलीप कई साल विदेश में रहा, कड़ी मेहनत की और अच्छी खासी कमाई करके अपने गाँव लौट आया। सबसे पहले उसने महाजन के पास जाकर अपना कर्ज चुकाया और अपना लोहे का तराजू वापस माँगा। महाजन लालची था। उसने देखा कि तराजू अच्छा और मूल्यवान है। उसने तराजू वापस देने से मना कर दिया और एक झूठी कहानी बनाई। उसने दिलीप से कहा, “बेटा, तुम्हारे तराजू की बड़ी दुर्गति हुई। मैंने उसे अपने कमरे में सुरक्षित रखा था, लेकिन कुछ चूहे आ गए और उस भारी लोहे के तराजू को कुतर-कुतर कर खा गए! अब तो उसका कुछ बचा ही नहीं है।”
दिलीप चालाक था। उसने महाजन की बात सुनी और बाहर से शांत दिखाई दिया। उसने एक पल भी विरोध नहीं किया। उसने कहा, “अरे, यह तो बड़े दुख की बात है। लेकिन अगर चूहों ने खा लिया तो यह आपकी गलती तो है नहीं। प्रकृति का नियम है। कोई बात नहीं।” महाजन सोचने लगा कि दिलीप मूर्ख है और आसानी से मान गया। पर दिलीप ने अपनी चालाकी से बदला लेने की योजना बना ली।
कुछ दिन बाद, दिलीप ने महाजन से कहा, “महाराज, आज मैं नदी में पवित्र स्नान करने जा रहा हूँ। आपका पुत्र भी मेरे साथ चल सकता है, उसका भी कल्याण होगा।” महाजन ने सोचा कि अच्छी बात है और अपने बेटे को दिलीप के साथ भेज दिया। दिलीप उस लड़के को नदी किनारे ले गया, लेकिन स्नान न कराकर उसे एक गुफा में बंद कर दिया और ताला लगा दिया। फिर वह अकेला वापस महाजन के पास आया।
महाजन ने पूछा, “मेरा बेटा कहाँ है?” दिलीप ने शांत भाव से कहा, “अरे, नदी किनारे एक विशालकाय गिद्ध आया और आपके बेटे को उठाकर ले गया!” महाजन गुस्से से लाल हो गया और चिल्लाया, “यह कैसे हो सकता है? इतने बड़े लड़के को गिद्ध कैसे उठा सकता है? यह असंभव है!”
तब दिलीप ने धीरे से कहा, “जिस दुनिया में चूहे भारी लोहे के तराजू को खा सकते हैं, उस दुनिया में गिद्ध एक लड़के को उठाकर क्यों नहीं ले जा सकता?” यह सुनते ही महाजन की आँखें खुल गईं। उसे अपनी गलती और धोखेबाजी का एहसास हुआ। वह तुरंत समझ गया कि दिलीप उसकी झूठी कहानी का जवाब दे रहा है। शर्मिंदा होकर उसने दिलीप से माफ़ी माँगी और उसका लोहे का तराजू वापस कर दिया। उसके बाद ही दिलीप ने उसके बेटे को गुफा से आज़ाद किया। दोनों ने एक-दूसरे से सबक सीखा।
शिक्षा: बुरा कर्म करने वाले का बुरा अंत होता है। झूठ और धोखे से मिली चीज़ कभी टिकती नहीं। बुद्धिमानी इसी में है कि दूसरों के साथ वैसा ही व्यवहार करो जैसा आप अपने लिए चाहते हैं।
4. चार ब्राह्मण

एक गाँव में चार ब्राह्मण रहते थे। उनमें से तीन ब्राह्मणों ने तंत्र-मंत्र और जादू-टोने की विद्या सीख रखी थी। उन्हें अपनी शक्तियों पर बहुत घमंड था। चौथा ब्राह्मण इन विद्याओं में निपुण नहीं था, उसने केवल साधारण ज्ञान और विवेक ही सीखा था। इस वजह से तीनों ब्राह्मण उसका नियमित रूप से मजाक उड़ाया करते थे, उसे मूर्ख और निकम्मा कहकर अपमानित करते। चौथा ब्राह्मण धैर्यवान था, वह चुपचाप सब सहन कर लेता था।
एक दिन उन तीनों ब्राह्मणों ने निश्चय किया कि वे पास के एक बड़े शहर जाएँगे और अपनी जादुई कलाओं का प्रदर्शन करके बहुत सारा धन और यश कमाएँगे। जब वे यात्रा पर निकलने लगे, तो चौथे ब्राह्मण ने उनसे अनुरोध किया, “मित्रों, मुझे भी अपने साथ चलने दो। हम साथ रहेंगे तो मार्ग में किसी प्रकार का भय नहीं होगा।” तीनों जादूगर ब्राह्मण हँस पड़े। पहले ने कहा, “तुम्हारे साथ क्या फायदा? तुम तो कोई विद्या जानते ही नहीं!” दूसरे ने ताना मारा, “हमारे साथ वही चल सकता है जो हमारे काम आ सके।” तीसरे ने व्यंग्य से कहा, “ठीक है, तुम चल सकते हो, पर शर्त यह है कि रास्ते का सारा सामान तुम उठाओगे, हमारे भोजन की व्यवस्था करोगे और हमारी सेवा करोगे।” चौथा ब्राह्मण इन अपमानजनक शर्तों को भी स्वीकार करने को तैयार हो गया, क्योंकि वह उनसे अलग नहीं होना चाहता था।
चारों ब्राह्मण यात्रा पर निकल पड़े। जंगल के रास्ते में चलते-चलते उन्हें एक सूखे पेड़ के नीचे कुछ पड़ा दिखाई दिया। नज़दीक जाकर देखा तो वह एक जानवर की सफेद हड्डियों का पूरा ढाँचा (कंकाल) था। यह देखकर तीनों जादूगर ब्राह्मणों का अहंकार जाग उठा। उन्होंने सोचा कि यह अपनी शक्तियाँ दिखाने और चौथे ब्राह्मण को हैरान करने का बहुत अच्छा मौका है।
पहले ब्राह्मण ने गर्व से कहा, “देखो, मैं क्या कर सकता हूँ। मेरी विद्या इतनी शक्तिशाली है कि मैं इन बिखरी हुई हड्डियों को जोड़ सकता हूँ!” उसने कुछ मंत्र पढ़े और अस्थि-पंजर जुड़कर एक पूरा कंकाल बन गया। दूसरे ब्राह्मण ने कहा, “यह तो कुछ भी नहीं! मेरी शक्ति से मैं इस कंकाल पर मांस, खाल और नसें चढ़ा सकता हूँ!” उसने भी अपना जादू चलाया और देखते ही देखते हड्डियों के ढाँचे पर मांस और चमड़ा चढ़ गया। अब वह एक बेजान शेर के शरीर जैसा दिखने लगा।
तीसरा ब्राह्मण बोला, “तुम दोनों ने जो किया, वह मामूली बात है। असली शक्ति तो प्राण डालने की है, और वह केवल मैं ही कर सकता हूँ!” चौथा ब्राह्मण यह सब देख रहा था। उसने डरकर और समझाकर कहा, “मित्रों, रुक जाओ! यह एक खतरनाक जानवर का शरीर है। यदि तुमने इसमें प्राण डाल दिए, तो यह जीवित हो उठेगा और हम सबको मार डालेगा। कृपया अपनी शक्तियों का दुरुपयोग मत करो।”
लेकिन तीनों ब्राह्मणों को अपने ज्ञान पर इतना गर्व था कि उन्होंने चौथे की सलाह को तुच्छ ज्ञान समझकर नकार दिया। तीसरे ब्राह्मण ने घमंड से कहा, “तू चुप रह! तेरी क्या बिसात कि हमें सलाह दे!” और उसने मंत्र पढ़कर उस शरीर में प्राण डाल दिए। तुरंत ही वह शेर जीवित हो उठा, अपनी आँखें खोलीं, जोर से दहाड़ा और अपने शिकार की तलाश में आसपास देखने लगा।
तीनों ब्राह्मण अब अपनी मूर्खता समझ गए, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। भूखा शेर उन पर टूट पड़ा और एक-एक करके तीनों को मारकर खा गया। चौथा ब्राह्मण, जिसने पहले ही आशंका कर ली थी, वह सब कुछ देख रहा था। वह चुपचाप एक पेड़ पर चढ़ गया था। शेर के चले जाने के बाद वह नीचे उतरा और दुखी मन से अकेले ही गाँव की ओर लौट पड़ा।
शिक्षा: केवल तकनीकी ज्ञान या विशेष शक्तियाँ ही जीवन के लिए पर्याप्त नहीं हैं। सच्ची बुद्धिमानी सामान्य ज्ञान और विवेक में होती है। घमंड और अहंकार मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है, जो उसका विनाश करवा देता है।
10. खटमल और जूँ

एक राजा का महल बहुत भव्य और सुंदर था। राजा का शयनकक्ष तो इतना विशाल और आरामदायक था कि उसमें रहने वाले छोटे-छोटे जीवों को भी राजसी ठाठ का अहसास होता था। उसी शयनकक्ष में, राजा के बिस्तर की चादरों और तकियों के बीच, एक जूँ रहती थी। वह बहुत समझदार और सतर्क जूँ थी। उसका नाम था रक्तपा (काल्पनिक नाम)। रक्तपा ने महल में रहने का एक नियम बना रखा था – वह केवल रात के समय, जब राजा गहरी नींद में सो जाता, तभी उसका खून पीती थी। वह इतनी हल्की और सावधानी से काटती कि राजा को कभी पता ही नहीं चलता था। इस तरह वह वर्षों से आराम से रह रही थी और राजा के रक्त का आनंद ले रही थी।
एक दिन एक खटमल उस शयनकक्ष में आ घुसा। खटमल देखने में जूँ से कुछ बड़ा और मोटा था, और उसकी प्रवृत्ति बहुत धूर्त और लालची थी। उसने शाही शयनकक्ष की विलासिता देखी तो उसके मन में लालच जाग उठा। उसने सोचा, “यहाँ तो सोने पर सुहागा है! राजा का खून, जो सबसे शुद्ध और पौष्टिक होगा। मुझे यहीं बस जाना चाहिए।” उसकी नजर जूँ रक्तपा पर पड़ी। वह उसके पास गया और मीठी आवाज में बोला, “नमस्ते बहन! तुम कितनी सुंदर और राजसी दिख रही हो। तुम इस महल की निवासिनी लगती हो। मैं एक गरीब यात्री हूँ, लंबी यात्रा से थककर यहाँ आया हूँ। क्या मैं एक रात के लिए यहाँ शरण ले सकता हूँ?”
रक्तपा एक भोली और धर्मपरायण जूँ थी। उसने अतिथि सत्कार का नियम याद किया। उसने कहा, “अरे भाई, यह तो बहुत अच्छा है कि तुम यहाँ आए। अतिथि तो देवता होता है। तुम यहाँ रह सकते हो। पर एक बात का ध्यान रखना, यह राजा का शयनकक्ष है। हमें यहाँ बहुत शांत और सतर्क रहना पड़ता है। तुम रात में राजा को काटना नहीं। मैं तुम्हें कल सुबह भोजन का इंतजाम कर दूँगी।”
खटमल ने चापलूसी भरे स्वर में कहा, “अरे बहन, तुम कैसी बात करती हो! मैं तो बस एक रात आराम करना चाहता हूँ। मैं भूखा रह जाऊँगा, पर राजा को कष्ट नहीं दूँगा। मेरा वचन है।” रक्तपा ने उसकी बातों पर विश्वास कर लिया और उसे शयनकक्ष में रहने की अनुमति दे दी।
रात हुई। राजा अपने विशाल पलंग पर आकर सो गए। रक्तपा, अपनी आदत के अनुसार, इंतजार करने लगी कि जब राजा गहरी नींद में सो जाएँ, तब वह सावधानी से उनका खून पिए। पर खटमल लालची था। उसने राजा के मोटे और कोमल शरीर को देखा तो उससे रहा न गया। उसने अपना वचन तोड़ दिया और रक्तपा को बताए बिना ही राजा के पैर की ओर रेंगता हुआ चला गया। उसने सोचा, “एक बार काटूंगा तो क्या हो जाएगा? राजा को पता भी नहीं चलेगा।” पर खटमल की प्रकृति ही ऐसी थी। वह हल्का काटता नहीं था। उसने जैसे ही राजा की त्वचा पर डंक मारा, एक तेज चुभन हुई।
राजा की नींद टूट गई। “अरे!” वह चिल्लाकर उठ बैठे। उन्होंने पैर में तेज खुजली और दर्द महसूस किया। उन्होंने दीया जलाकर देखा तो पैर पर एक लाल निशान था। राजा को बहुत गुस्सा आया। उन्होंने तुरंत सेवकों को बुलवाया और गरजकर कहा, “मेरे शयनकक्ष में कीड़े हैं! यह असहनीय है! तुरंत इस पूरे बिस्तर की चादरें, तकिए, गद्दे – सब कुछ बदल दो और इन सब कीड़े-मकोड़ों को मार डालो!”
सेवकों ने तुरंत काम शुरू कर दिया। उन्होंने चादरें उतारनी शुरू कीं और हर तरफ कीड़ों को ढूंढकर मारना शुरू कर दिया। खटमल चालाक था। वह तुरंत पलंग के नीचे की एक दरार में घुसकर छिप गया। सेवकों की नजर उस पर नहीं पड़ी। पर बेचारी रक्तपा कहाँ जाती? वह तो चादर के ऊपरी हिस्से में छिपी हुई थी। एक सेवक ने जैसे ही चादर को झटका, रक्तपा नीचे गिर पड़ी। सेवक ने उसे देख लिया और तुरंत उसपर जूता पटक दिया। रक्तपा की तत्काल मृत्यु हो गई। इस तरह, एक विश्वासघाती और लालची अतिथि के कारण, एक निर्दोष और सतर्क जूँ ने अपनी जान गँवा दी।
खटमल बच तो गया, पर उसका अंत भी कुछ दिनों बाद ही हो गया, क्योंकि अब महल में सफाई का सख्त बंदोबस्त हो गया था। पर उसकी धूर्तता ने एक निष्पाप प्राणी को मौत के घाट उतार दिया था।
शिक्षा: चिकनी-चुपड़ी बातों और झूठे वादों पर आसानी से विश्वास नहीं करना चाहिए। धूर्त और लालची लोग अपने फायदे के लिए दूसरों का विश्वास तोड़ देते हैं और उन्हें संकट में डाल देते हैं। सतर्क रहो और लोगों के कर्मों पर नजर रखो, केवल उनकी बातों पर नहीं।
11. बगुला और केकड़ा

एक घने जंगल में एक विशाल पुराना पेड़ था। उस पेड़ के खोखले तने में एक बगुली रहती थी। पेड़ की जड़ों के पास एक बिल में एक साँप रहता था। बगुली के अंडे देने का समय आया तो उसने अपना घोंसला बनाया और अंडे दिए। पर दुर्भाग्यवश, जब भी बगुली भोजन की तलाश में बाहर जाती, साँप उसके घोंसले में घुस जाता और उसके अंडे खा जाता। यह क्रम कई बार हुआ। बगुली बहुत दुखी थी। वह अपने बच्चों को खो चुकी थी और उस साँप से बदला लेना चाहती थी, पर वह अकेली और निर्बल थी। वह पेड़ पर बैठकर रोने लगी, “हाय! मेरे बच्चे! उस दुष्ट साँप ने सब नष्ट कर दिया।”
पास ही एक तालाब था। उस तालाब में एक केकड़ा रहता था। केकड़ा बुद्धिमान और चतुर था। उसने बगुली का रोना सुना तो उससे बात की। बगुली ने अपना दुखड़ा सुनाया। केकड़े ने सोचा, “यह बगुली मेरी सहायता से साँप से छुटकारा पा सकती है। और अगर साँप मर गया, तो मेरा भी एक प्रतिद्वंद्वी खत्म हो जाएगा, क्योंकि साँप कभी-कभी तालाब के किनारे आकर मेरे साथी केकड़ों को भी खा जाता है। मैं एक ऐसी योजना बनाता हूँ जिससे दोनों काम हो जाएँ।” केकड़े ने बगुली से कहा, “मैं तुम्हारी मदद कर सकता हूँ। तुम उदास मत हो। मेरी एक योजना है।”
बगुली ने उम्मीद भरी नजरों से पूछा, “क्या योजना है?” केकड़ा बोला, “सुनो, इस जंगल के दूसरी ओर एक नेवला रहता है। नेवला साँप का सबसे बड़ा शत्रु होता है। तुम उस नेवले के घर तक मांस के टुकड़े बिछा दो। साँप मांस की गंध से लालच में आकर उस रास्ते चलेगा और नेवले के घर के पास पहुँच जाएगा। नेवला उसे देखते ही मार डालेगा।” बगुली को यह योजना बहुत पसंद आई। उसने तुरंत एक मरे हुए जानवर से मांस के टुकड़े लाए और उन्हें एक लकीर में बिछाना शुरू कर दिया। लकीर सीधी उस नेवले के बिल तक जा पहुँची।
शाम होते ही साँप अपने बिल से बाहर निकला। उसे मांस की सुगंध आई। वह लालच में आ गया और टुकड़े चाटता हुआ उसी रास्ते चल पड़ा। वह रास्ता सीधा नेवले के बिल तक ले गया। नेवला बिल के पास ही बैठा था। उसने साँप को देखा तो उसकी प्रवृत्ति जाग उठी। उसने तेजी से छलाँग लगाई और साँप के गले में जा काटा। साँप और नेवले में भयंकर लड़ाई हुई, पर अंत में नेवला विजयी रहा। साँप मर गया। बगुली बहुत खुश हुई। उसका शत्रु समाप्त हो गया था।
अब केकड़े की चाल का दूसरा पहलू सामने आया। बगुली ने सोचा, “आज तो बहुत अच्छा हुआ। अब मैं निश्चिंत होकर अपने अंडे दे सकती हूँ। केकड़े ने मेरी बहुत मदद की।” पर केकड़े का इरादा कुछ और ही था। वह जानता था कि नेवला केवल साँप ही नहीं, बगुली के अंडों और चूजों को भी खा सकता है। और अगर बगुली भी न रहे, तो तालाब के आसपास उसका कोई प्रतिद्वंद्वी न बचे। अगले दिन, जब बगुली अपने घोंसले में बैठी हुई थी, नेवला भोजन की तलाश में इधर-उधर घूम रहा था। उसकी नजर पेड़ पर बगुली के घोंसले पर पड़ी। नेवले को पक्षियों के अंडे और चूजे भी बहुत पसंद थे। वह पेड़ पर चढ़ गया और बगुली पर हमला कर दिया। बगुली अपना बचाव नहीं कर पाई और नेवले ने उसे मार डाला।
इस प्रकार, केकड़े की चालाक योजना से दोनों उसके प्रतिद्वंद्वी – साँप और बगुली – समाप्त हो गए। केकड़ा तालाब में सुरक्षित रहा और उसकी चतुराई सफल रही। बगुली ने अपने एक शत्रु से छुटकारा पाने के लिए दूसरे शत्रु की मदद ली, पर यह नहीं सोचा कि वह दूसरा शत्रु उसके लिए भी उतना ही खतरनाक साबित हो सकता है।
शिक्षा: किसी समस्या से निपटने के लिए जल्दबाजी में कोई योजना नहीं बनानी चाहिए। हर योजना के दूरगामी परिणामों पर विचार करना आवश्यक है। कई बार एक संकट से बचने के लिए अपनाया गया रास्ता दूसरे, बड़े संकट का कारण बन जाता है। सोच-समझकर और संपूर्ण विवेचना के बाद ही कोई कदम उठाना चाहिए।
12. शेर और गीदड़

हिमालय की तराई में एक घने जंगल में एक पराक्रमी और तेजस्वी शेर रहता था। वह जंगल का राजा था और सभी प्राणी उससे भयभीत रहते थे। उसकी गर्जना सुनकर पूरा जंगल थर्रा उठता। वह अपनी शक्ति और सामर्थ्य के बल पर भरपूर शिकार करता और आनंद से जीवन व्यतीत करता था।
उसी जंगल में एक दुर्बल और क्षीणकाय गीदड़ भी रहता था। वह हमेशा भूखा रहता और दूसरों के जूठन पर पलता था। एक दिन वह बहुत दुर्बल हो गया और उससे चला भी नहीं जा रहा था। तभी उसने दूर से शेर की गर्जना सुनी। एक विचार उसके मन में आया। वह लंगड़ाता हुआ शेर के पास पहुँचा और उसके सामने सिर झुकाकर बोला, “हे जंगलाधिपति! महाराज! मैं एक अभागा और निर्बल गीदड़ हूँ। मेरे पास न तो आप जैसी शक्ति है, न ही शिकार करने की क्षमता। मैं भूख से मर रहा हूँ। कृपया मुझ पर दया करें और मुझे अपना सेवक बना लें। मैं आपकी सेवा में हमेशा तत्पर रहूँगा। मैं आपके शिकार के बाद बचे हुए मांस से ही अपना पेट भर लूँगा। आपको कोई कष्ट नहीं होगा।”
शेर दयालु भी था। उसने गीदड़ की दुर्दशा देखी तो उसे दया आ गई। उसने कहा, “ठीक है, तुम मेरे साथ रह सकते हो। मेरे शिकार के बाद जो बचेगा, तुम उसे खा लेना।” गीदड़ खुशी से झूम उठा। अब उसे भोजन की चिंता नहीं थी। वह शेर के पीछे-पीचे घूमता और उसके शिकार के बाद मिलने वाले पौष्टिक मांस को खाता। धीरे-धीरे उसका शरीर स्वस्थ और मोटा होने लगा। उसकी दुर्बलता दूर हो गई और वह ताकतवर महसूस करने लगा।
अब उस गीदड़ के मन में अहंकार ने जन्म लेना शुरू कर दिया। वह सोचने लगा, “मैं भी तो शेर के जैसा मांस खाता हूँ। मेरा शरीर भी मजबूत हो गया है। शायद मैं भी उतना ही शक्तिशाली हूँ जितना शेर। क्यों न मैं स्वयं शिकार करके दिखाऊँ? फिर तो शेर भी मेरी प्रशंसा करेगा और मैं उसके बराबर माना जाने लगूँगा।” एक दिन उसने शेर से कहा, “महाराज! आपकी कृपा से मैं अब बहुत बलवान हो गया हूँ। मैं चाहता हूँ कि अब मैं स्वयं एक बड़ा शिकार करूँ और उसका मांस आपके सामने भेंट करूँ। मुझे विश्वास है कि मैं एक हाथी को मार सकता हूँ।”
शेर ने गीदड़ की बात सुनकर उसे समझाने का प्रयास किया। वह बोला, “मित्र, तुम्हारे मन में उत्साह अच्छी बात है, पर हाथी का शिकार करना तुम्हारे बस की बात नहीं है। हाथी विशालकाय और शक्तिशाली होता है। तुम छोटे हो और तुम्हारे पास उससे लड़ने के हथियार भी नहीं हैं। तुम मेरे साथ रहो, सुरक्षित रहोगे।” पर गीदड़ के अहंकार ने उसे अंधा कर दिया था। उसने शेर की बात को डाँट समझा और उल्टा यह सोचा कि शेर उसकी बढ़ती ताकत से ईर्ष्या कर रहा है। उसने दृढ़तापूर्वक कहा, “नहीं महाराज, मैं करके दिखाऊँगा। आप देख लेना।”
अगले दिन गीदड़ शिकार करने निकल पड़ा। वह एक ऊँची चट्टान पर चढ़ गया जहाँ से नीचे हाथियों का झुंड दिखाई दे रहा था। उसने सोचा, “मैं ऊपर से कूदकर सीधे हाथी के सिर पर गिरूँगा और उसे मार डालूँगा।” उसने एक मोटे हाथी को निशाना बनाया, जो शांतिपूर्वक पेड़ की पत्तियाँ चर रहा था। गीदड़ ने जोर से छलाँग लगाई। पर उसकी गणना गलत थी। वह हाथी के सिर तक पहुँच ही नहीं सका। उसकी छलाँग कमजोर पड़ गई और वह सीधा हाथी के पैरों के पास जा गिरा।
हाथी को कुछ समझ में नहीं आया। उसने सामान्य रूप से आगे बढ़ना जारी रखा और अपने भारी पैर गीदड़ के ऊपर रख दिए। गीदड़ के शरीर की हड्डियाँ चकनाचूर हो गईं। उसने एक कराह भरी और वहीं प्राण त्याग दिए। शेर को जब यह समाचार मिला, तो वह दुखी हुआ। उसने कहा, “अहंकार और मूर्खता ने इस बेचारे का अंत कर दिया। मैंने समझाया था, पर वह नहीं माना।”
शिक्षा: अहंकार व्यक्ति को अंधा बना देता है और उसे अपनी वास्तविक क्षमता का आकलन करने से रोकता है। दूसरों की सफलता और सुविधा देखकर स्वयं को उनके समान समझना मूर्खता है। बुद्धिमान व्यक्ति को अपनी सीमाएँ पहचाननी चाहिए और दूसरों के समझाने पर उनकी बात माननी चाहिए।
13. हाथी और गौरैया

एक हरे-भरे जंगल में एक ऊँचे और फैले हुए पेड़ पर एक गौरैया जोड़ा रहता था। उन्होंने बड़े प्यार से अपना घोंसला बनाया था और उसमें उनके सुंदर नीले अंडे थे। गौरैया जोड़ा बारी-बारी से अंडों को सेता और भोजन की तलाश में जाता। वे बहुत खुश थे और अपने होने वाले बच्चों के स्वागत की तैयारी में लगे हुए थे।
एक दिन जंगल में एक विशालकाय जंगली हाथी आ धमका। वह अपने झुंड से बिछड़ गया था और गुस्से में तथा प्यासा था। उसने पेड़ों को तोड़ते हुए और रास्ते में आने वाली हर चीज को रौंदते हुए चलना शुरू किया। वह उसी पेड़ के पास आया जिस पर गौरैयों का घोंसला था। प्यास बुझाने के लिए उसने अपनी सूँड पेड़ की निचली शाखाओं में लपेटी और जोर से हिलाया। पूरा पेड़ जोर से हिल उठा, ऐसा लगा जैसे भूकंप आ गया हो। घोंसला डाल से टूटकर नीचे जमीन पर आ गिरा और सारे अंडे टूट गए। गौरैया जोड़ा उस समय भोजन की तलाश में बाहर गया हुआ था।
जब वे लौटे तो उनकी दुनिया उजड़ी हुई पाई। टूटा हुआ घोंसला और फूटे हुए अंडे देखकर दोनों का दिल टूट गया। मादा गौरैया विलाप करने लगी। नर गौरैया गुस्से से भर गया। उसने कहा, “इस हाथी ने हमारे भावी संतान को नष्ट कर दिया। हमें इसका बदला लेना होगा। हम अकेले इतने बड़े हाथी से नहीं लड़ सकते, पर हमें अपने मित्रों की सहायता लेनी चाहिए।” गौरैया जोड़ा ने एक योजना बनाई।
वे सबसे पहले अपने मित्र लकड़कुटा (कठफोड़वा) के पास गए, जो अपनी नुकीली चोंच से पेड़ों में छेद करके रहता था। उन्होंने उसे पूरी कहानी सुनाई और सहायता माँगी। लकड़कुटा ने कहा, “तुम्हारा दुख मेरा दुख है। मैं तुम्हारी मदद करूँगा। बताओ मैं क्या कर सकता हूँ?” गौरैया बोला, “हमें हाथी को अंधा करने की जरूरत है, ताकि वह देख न सके और भटकता रहे। क्या तुम उसकी आँखें फोड़ सकते हो?” लकड़कुटा ने हामी भरी, “हाँ, मेरी चोंच बहुत पैनी है। मैं ऐसा कर सकता हूँ।”
फिर वे एक मेढक के पास गए, जो तालाब के किनारे रहता था और बहुत चतुर था। मेढक ने भी उनकी समस्या सुनी तो कहा, “मैं भी तुम्हारी मदद करूँगा। मेरे और मेरे साथियों के पास एक विशेष योग्यता है। हम मिलकर इतना शोर मचा सकते हैं कि हाथी समझे कि पास में बड़ा तालाब है।” गौरैया ने कहा, “बिल्कुल! यही तो हम चाहते हैं।”
योजना बनी। अगले दिन, जब हाथी एक पेड़ के नीचे आराम कर रहा था, लकड़कुटा चुपके से पेड़ पर चढ़ा और ऊपर से हाथी पर निशाना लगाया। उसने तेजी से उड़ान भरी और अपनी नुकीली चोंच से हाथी की एक आँख में जोरदार वार किया। हाथी दर्द से चीख उठा और उसकी एक आँख से खून बहने लगा। फिर लकड़कुटा ने दूसरी तरफ से दोबारा हमला किया और हाथी की दूसरी आँख भी फोड़ दी। अब हाथी पूरी तरह अंधा हो गया था। वह दर्द और गुस्से में पागलों की तरह इधर-उधर भागने लगा, पर कुछ दिखाई नहीं दे रहा था।
अब मेढक और उसके सैकड़ों साथियों की बारी थी। वे एक दलदली और कीचड़भरे गड्ढे के पास इकट्ठे हुए, जो जंगल में एक खतरनाक स्थान था। सभी मेढक मिलकर जोर-जोर से टर्र-टर्र की आवाज करने लगे। एक मेढक की आवाज छोटी होती है, पर सैकड़ों मेढकों का समूह इतना शोर मचा सकता है कि दूर से लगे कि कोई बड़ा जलाशय है। अंधा हाथी प्यास से व्याकुल था। उसे मेढकों का शोर सुनाई दिया। उसने सोचा कि यह आवाज निश्चित रूप से किसी बड़े तालाब की है। प्यास के मारे उसने आवाज की दिशा में दौड़ लगा दी।
वह सीधा उस दलदली गड्ढे की ओर भागा। अंधा होने के कारण उसे कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। जैसे ही उसने गड्ढे में पैर रखा, उसका पैर कीचड़ में धँस गया। उसने बाहर निकलने की कोशिश की, पर कीचड़ उसे और खींचने लगा। वह जितना जोर लगाता, उतना ही गहरा धँसता जाता। आखिरकार, थक-हारकर और कोई रास्ता न पाकर, वही उस विशालकाय हाथी की दलदल में दफन होकर मृत्यु हो गई।
गौरैया जोड़ा, लकड़कुटा और मेढक सभी एक स्थान पर इकट्ठे हुए। गौरैया ने कहा, “मित्रों, तुम्हारी सहायता के बिना यह संभव नहीं था। तुमने साबित कर दिया कि एकजुटता में कितनी शक्ति होती है।” सभी मित्र खुश हुए। गौरैया जोड़े ने फिर से अपना घोंसला बनाया और इस बार उनके चूजे सुरक्षित रूप से जन्म ले सके।
शिक्षा: एकता में अद्भुत शक्ति होती है। कोई भी कार्य, चाहे वह कितना भी कठिन क्यों न हो, मिल-जुलकर और योजनाबद्ध तरीके से किया जाए तो सफलता अवश्य मिलती है। छोटे-छोटे प्राणी भी एकजुट होकर एक विशाल शत्रु को पराजित कर सकते हैं।
14. गधा और घोड़ा

एक नगर में एक धोबी रहता था। उसके पास दो पशु थे – एक गधा और एक घोड़ा। गधा मजबूत और सहनशील था, जबकि घोड़ा सुंदर और तेज था, पर उसे अपने रूप और गति पर बहुत घमंड था। धोबी का काम था लोगों के गंदे कपड़े इकट्ठे करना, उन्हें नदी पर धोना और सुखाकर वापस पहुँचाना। इस पूरे काम में गधा ही मुख्य भार वाहक था। वह सुबह से शाम तक गंदे कपड़ों के गठ्ठर और फिर धुले हुए कपड़ों के बोझ को ढोता रहता। उसकी पीठ पर भारी बोझ लदा रहता और वह चुपचाप सब सहन कर लेता।
घोड़े का काम केवल धोबी की सवारी करना था। जब धोबी को किसी दूर के गाँव में कपड़े पहुँचाने होते या कोई जरूरी काम होता, तो वह घोड़े पर सवार होकर जाता। घोड़ा हल्का दौड़ता और अपनी चमकदार चाल से सबका ध्यान आकर्षित करता। बाकी समय वह आराम करता। इस आराम और विशेषाधिकार ने घोड़े में अहंकार भर दिया था। वह गधे को हीन दृष्टि से देखता और अक्सर उसका मजाक उड़ाता। वह कहता, “अरे भैया गधे, तुम्हारी किस्मत ही खराब है जो तुम्हें इतना भार ढोना पड़ता है। देखो मैं कितना आराम से रहता हूँ। मेरे जैसा सुंदर और तेज घोड़ा कोई और नहीं।”
गधा विनम्र और समझदार था। वह घोड़े की बातों को अनसुना कर देता और अपना काम करता रहता। वह जानता था कि हर किसी का अपना महत्व होता है। एक दिन धोबी को बहुत अधिक कपड़े धोने थे। बाजार से कपड़ों के ढेर सारे गठ्ठर आए। गधे ने देखा कि आज का बोझ सामान्य दिनों से कहीं अधिक है। वह थोड़ा चिंतित हुआ। उसने घोड़े से विनम्रता से कहा, “भाई घोड़ा, आज का बोझ बहुत ज्यादा है। अगर तुम थोड़ी सी मदद कर दो, तो मेरा काम आसान हो जाएगा और हम जल्दी नदी पहुँच जाएँगे। तुम थोड़ा सा बोझ अपनी पीठ पर ले लो।”
घोड़ा तनिक रूखे स्वर में बोला, “मैं? बोझ ढोऊँ? तुम्हें शर्म नहीं आती ऐसा कहने में? मैं एक सुंदर घोड़ा हूँ, मेरी पीठ पर सवारी होती है, बोझ नहीं। यह तुम्हारा काम है। मैं तो केवल धोबी महाराज की सवारी के लिए हूँ। तुम अपना काम करो और मुझे तंग मत करो।” इतना कहकर घोड़ा अलग हो गया। गधे ने फिर कुछ नहीं कहा। उसने पूरा भार अकेले उठाया और धीरे-धीरे कदम बढ़ाते हुए नदी की ओर चल पड़ा। भार अत्यधिक था और सूरज भी चिलचिला रहा था। गधा पसीने से लथपथ हो गया, पर वह चलता रहा।
नदी पर पहुँचकर धोबी ने सारे कपड़े धोए और उन्हें सुखाने के लिए फैला दिया। फिर धुले हुए सूखे कपड़ों को लादने का समय आया। यह बोझ गंदे कपड़ों से भी अधिक भारी लग रहा था, क्योंकि कपड़े पानी से भीगकर भारी हो गए थे। गधा फिर से घोड़े के पास गया और बोला, “भाई, अब तो देखो, यह बोझ और भी ज्यादा है। कृपया इस बार मदद कर दो। हम दोनों मिलकर इसे ढो लेंगे।” घोड़े ने घृणा भरी नजर से देखा और डपटकर बोला, “दूर रह! मैंने पहले ही कह दिया है। मेरा काम यह नहीं है। तुम अपनी औकात में रहो।” और वह वहाँ से चला गया।
गधे ने हार नहीं मानी। उसने सारा भार फिर से अपनी पीठ पर लादा और चल पड़ा। भार, गर्मी और थकान के कारण उसका दम घुटने लगा। वह कदम-कदम पर थककर रुक जाता, पर फिर आगे बढ़ जाता। आखिरकार, अत्यधिक बोझ और कष्ट सहन न कर पाने के कारण, रास्ते में ही वह बेहोश होकर गिर पड़ा और उसने दम तोड़ दिया।
धोबी को बड़ा दुख हुआ, पर अब क्या कर सकता था। उसने गधे को वहीं दफना दिया। अब समस्या यह थी कि कपड़े कैसे ले जाएँ? धोबी के पास केवल घोड़ा बचा था। उसने सोचा, “कोई बात नहीं, घोड़ा तेज है, वही यह बोझ ढो लेगा।” उसने सारा कपड़ों का भार घोड़े की पीठ पर लाद दिया। घोड़े ने विरोध किया, “नहीं! यह मेरा काम नहीं है! मैं सवारी ढोता हूँ, बोझ नहीं!” पर धोबी ने कहा, “अब गधा तो है नहीं। तुम्हीं यह काम करोगे।”
घोड़े को मजबूरी में सारा भार ढोना पड़ा। वह भारी बोझ के नीचे कराह उठा। उसे अब एहसास हुआ कि गधा कितना मजबूत और सहनशील था। अगर उसने थोड़ी-सी मदद कर दी होती, तो गधा जीवित रहता और बोझ दोनों पर बँट जाता। अब उसे पूरा भार अकेले ढोना पड़ रहा था और वह इसके लिए तनिक भी तैयार नहीं था। वह पछताने लगा, पर अब पछताए होत क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत।
शिक्षा: घमंड और स्वार्थ अंततः विनाश का कारण बनते हैं। दूसरों की मदद करने से न केवल उनका भला होता है, बल्कि अंततः अपना भी भला होता है। एकजुटता और सहयोग से काम करने पर बोझ हल्का हो जाता है और सबका कल्याण होता है।
15. धोबी का गधा

एक धोबी के पास एक गधा था। धोबी गरीब था और उसके पास गधे के लिए पर्याप्त चारे के पैसे नहीं थे। वह गधे को कम खिलाता, जिससे गधा दिन-ब-दिन दुबला और कमजोर होता चला गया। एक दिन धोबी ने सोचा कि अगर गधा इतना कमजोर रहा, तो वह काम भी नहीं कर पाएगा और मर भी सकता है। उसे कुछ उपाय सोचना होगा।
संयोग से उसी दिन धोबी को जंगल में एक मरे हुए शेर की खाल मिली। उसने सोचा, “क्यों न इस खाल का कुछ उपयोग किया जाए?” वह शेर की खाल ले आया और एक योजना बनाई। उसने शेर की खाल को अपने गधे के ऊपर इस तरह डाल दिया कि वह पूरी तरह से ढक गया। केवल गधे की टाँगें और पेट का निचला हिस्सा ही दिखाई दे रहा था। दूर से देखने पर ऐसा लगता मानो कोई छोटा शेर खड़ा हो। धोबी ने रात के अंधेरे में उस “शेर-भेषी गधे” को खेतों की ओर भगा दिया।
गाँव के खेतों में रात का पहरा देने वालों ने अंधेरे में एक अजीब से जानवर को देखा, जो शेर जैसा दिख रहा था। वे डर गए और भाग खड़े हुए। उन्होंने सोचा कि जंगल से कोई शेर खेतों में घुस आया है। गधा, जो भूख से व्याकुल था, उसने खेतों में लगी हरी-हरी फसलों और सब्जियों को देखा तो उसने मनमाने ढंग से चरना शुरू कर दिया। उसने पेट भरकर खाया और सुबह होने से पहले ही धोबी के पास लौट आया। धोबी ने उससे शेर की खाल उतार ली और उसे बाँध दिया।
यह क्रम कई रातों तक चला। हर रात गधा शेर की खाल ओढ़कर खेतों में जाता, मनचाहा चारा चरता और लौट आता। खेत के मालिक हैरान थे कि यह “शेर” केवल फसलें ही क्यों चर रहा है और किसी पर हमला नहीं कर रहा। पर डर के मारे कोई उसके पास जाता नहीं था। गधा तो इतने स्वादिष्ट और ताजे चारे खा-खाकर मोटा और ताकतवर हो गया। उसे अपनी इस चालाकी पर घमंड हो गया। वह सोचने लगा कि वह इतना बुद्धिमान है कि सबको मूर्ख बना रहा है।
एक रात, जब गधा खेत में चर रहा था, तभी दूर कहीं एक दूसरे गधे ने जोरदार रेंकना शुरू कर दिया। “धाँय-धाँय-ओ-धाँय!” यह आवाज रात की शांति में साफ सुनाई दे रही थी। हमारा गधा, जो शेर का भेष बनाकर बैठा था, उसे यह आवाज सुनकर अपने भाई की आवाज पहचान में आ गई। वह अपने आप को रोक न सका। उसने सोचा, “अरे, यह तो मेरे जैसे गधे की आवाज है! शायद वह भी यहाँ कहीं है। मैं भी उसे जवाब दूँ।” उसका घमंड और उत्साह इतना बढ़ गया कि वह इस बात को भूल गया कि वह शेर का भेष बनाए हुए है।
उसने जोर से रेंकना शुरू कर दिया। “धाँय-धाँय-ओ-धाँय!” उसकी तेज और लंबी रेंक पूरे इलाके में गूँज उठी। खेत के पहरेदार, जो दूर से डरकर देख रहे थे, यह आवाज सुनकर चौंके। एक बोला, “यह क्या? शेर कभी इस तरह की आवाज नहीं निकालता। यह तो गधे की रेंक है!” दूसरा बोला, “हाँ! यह तो गधा है! किसी ने शेर की खाल ओढ़ाकर हमें डराया हुआ है!”
अब उनका डर जाता रहा। वे लाठी-डंडे लेकर उस “शेर” के पास पहुँचे। गधा अभी तक रेंक रहा था और अपनी चालाकी पर मग्न था। पहरेदारों ने पास आकर देखा तो सचमुच, खाल के नीचे से गधे के कान और चेहरे के हिस्से दिखाई दे रहे थे। उन्होंने पहचान लिया कि यह कोई शेर नहीं, बल्कि एक धोखेबाज गधा है।
गुस्से में आकर उन्होंने गधे पर लाठियों और पत्थरों की बौछार कर दी। गधा बचने की कोशिश करने लगा, पर शेर की भारी खाल उसे भागने नहीं दे रही थी। पहरेदारों ने उसे खूब पीटा। गधा जख्मी हो गया और वहीं गिर पड़ा। धोबी को सुबह पता चला तो वह दौड़ा-दौड़ा आया, पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी। गधा अपनी चोटों के कारण मर चुका था। धोबी की चालाकी और गधे का घमंड दोनों ने मिलकर उसकी जान ले ली।
शिक्षा: छल-कपट और धोखे से मिली सफलता कभी टिकती नहीं। अपनी वास्तविक पहचान और प्रकृति को छुपाने का प्रयास अंततः पकड़ा जाता है और उसका परिणाम बुरा होता है। ईमानदारी सबसे अच्छी नीति है।




