अबिरामी की असीम कृपा - True Devotion to Abirami

अबिरामी की असीम कृपा – True Devotion to Abirami

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अबिरामी की असीम कृपा

तमिलनाडु में एक बार अबिरामी देवी के एक महान भक्त रहते थे। उनका नाम सुब्रह्मण्यम था। वे देवी के प्रति इतने अनन्य भक्त थे कि हर किसी को उनके बारे में बताते और उनकी महिमा का प्रचार करते। वे अबिरामी मंदिर के पास लोगों के समूह जमा करते, देवी की कथाएँ सुनाते और उन्हें बताते कि देवी में महान चमत्कार करने की शक्ति है।

एक दिन वे ठीक उसी प्रकार लोगों के एक समूह को उपदेश दे रहे थे। उन्हें ज्ञात नहीं था कि उस प्रांत के राजा सरबोजी भी साधारण वेश में उसी भीड़ में बैठकर उन्हें सुन रहे हैं। जब भक्त ने कहा कि देवी अबिरामी अमावस्या को भी पूर्णिमा जैसा प्रकाश फैला सकती हैं, तो राजा तुरंत आगे आए, अपना छद्म वेश त्यागा और भक्त को चुनौती दी। राजा ने कहा कि अगली अमावस्या पर यदि भक्त अपने शब्दों को सिद्ध नहीं कर पाए, तो उनका सिर धड़ से अलग कर दिया जाएगा।

अगली अमावस्या आ गई। भक्त ने हमेशा की तरह देवी अबिरामी की आराधना जारी रखी, किंतु उनके मन में भय समा गया कि चंद्रमा प्रकट नहीं हुआ तो उनकी मृत्यु निश्चित है। इसी भय और विषम परिस्थिति में, भक्त ने देवी की अराधना में पूर्ण श्रद्धा से 100 पदों की रचना की, जो ‘अबिरामी अन्धादि’ के नाम से प्रसिद्ध हुई। इन भक्तिपूर्ण पदों से प्रसन्न होकर देवी ने अपने भक्त की रक्षा का मार्ग खोल दिया।

देवी अबिरामी सूर्य और चंद्रमा को अपने कुंडल के रूप में धारण करती हैं। कहा जाता है कि अपने भक्त की प्राणरक्षा के लिए उन्होंने चंद्रमा रूपी एक सोने का कुंडल निकाला और आकाश में फेंक दिया। वह गोलाकार चमकता हुआ कुंडल आकाश में एक पूर्ण चंद्रमा की भाँति जगमगाने लगा। पूरा आकाश उसके प्रकाश से जगमगा उठा।

राजा ने जब आकाश में पूर्ण चंद्रमा को चमकते देखा, तो वह अचंभित रह गया। उनकी शंका दूर हुई और भक्ति का भाव जाग्रत हुआ। उन्होंने न केवल भक्त की प्राणदान देकर उन्हें ‘अबिरामी पत्तर’ की उपाधि से विभूषित किया, बल्कि स्वयं भी देवी अबिरामी के परम भक्त बन गए। इस प्रकार देवी की असीम कृपा और भक्त की अटूट श्रद्धा ने एक अद्भुत चमत्कार दिखाया और सभी के हृदय में आस्था का दीप जलाया।

शिक्षा: अटूट भक्ति और सच्ची श्रद्धा हर असंभव को संभव कर सकती है।

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