विक्रम और बेताल: तीन वर और मंदारवती की पुनर्जन्म कथा
बहुत समय पहले एक प्रतिष्ठित और विद्वान पुरोहित के घर एक कन्या ने जन्म लिया जिसका नाम मंदारवती रखा गया। वह जन्म से ही अत्यंत सुंदर, सुसंस्कृत और सभी के हृदय को मोह लेने वाली थी। जैसे-जैसे वह बड़ी होती गई, उसकी सुंदरता और विनम्रता की प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैलने लगी। जब वह विवाह योग्य आयु तक पहुँची, तो उसके पिता के मन में चिंता उत्पन्न हुई कि उसकी योग्य वर के साथ कैसे और कब परिणय सम्पन्न होगा।
एक दिन तीन युवक उसके पिता के पास आए। वे तीनों गुणी, संस्कारी और विवाह के योग्य थे। प्रत्येक ने अलग-अलग समय पर पुरोहित से मंदारवती का हाथ माँगा। तीनों का आग्रह इतना प्रबल था कि उन्होंने यह तक कह दिया कि यदि मंदारवती किसी और से विवाह करेगी तो वे अपने प्राण त्याग देंगे। पुरोहित किसी एक को चुन नहीं पा रहा था, क्योंकि किसी एक को चुनने का अर्थ था शेष दो की मृत्यु। ऐसी कठिन परिस्थिति में उसने निर्णय लिया कि वह अपनी बेटी का विवाह तीनों में से किसी से भी नहीं करेगा।
लेकिन भगवान की इच्छा कुछ और ही थी। अचानक एक दिन मंदारवती को तेज और भयानक ज्वर हुआ। किसी भी औषधि का असर न हुआ और शीघ्र ही उसकी मृत्यु हो गई। यह समाचार सुनकर तीनों वर अत्यंत दुखी हो गए। वे उसे लेकर श्मशान पहुँचे और अत्यंत शोक के साथ उसका दाह संस्कार किया। उसके जाने से उनके जीवन में शून्यता भर गई थी।
दाह संस्कार के बाद तीनों ने अलग-अलग मार्ग अपनाए। पहला वर श्मशान में ही रह गया। उसने मंदारवती की अस्थियों की राख पर ही सोने का निर्णय लिया, मानो उसके निकट रहने में ही उसे संतोष मिल रहा हो। दूसरा वर मंदारवती की अस्थियाँ लेकर पवित्र गंगा के तट पर गया, ताकि वह उनके अस्थि-विसर्जन के द्वारा उसे अगला जन्म प्राप्त कराने में सहायक हो सके। तीसरा वर गहन दुःख से विचलित होकर संसार त्याग कर संन्यासी बन गया और इधर-उधर भटकने लगा।
अपनी यात्राओं के दौरान तीसरा वर एक दिन एक ब्राह्मण के घर पहुँचा। वह ब्राह्मण अत्यंत सिद्ध और शक्तिशाली था। उसके पास एक रहस्यमयी ग्रंथ था जिसमें एक ऐसी विद्या वर्णित थी जिसके द्वारा राख से भी मृत व्यक्ति को जीवित किया जा सकता था। यह ग्रंथ ब्राह्मण अत्यंत सावधानी से सुरक्षित रखता था। लेकिन तीसरे वर के मन में मंदारवती को जीवित देखने की प्रबल इच्छा जाग उठी। उसी रात उसने चोरी-छिपे वह ग्रंथ ले लिया और वापस उसी श्मशान भूमि में पहुँच गया जहाँ मंदारवती की चिता थी।
उधर दूसरा वर गंगा से लौट चुका था और वह पवित्र गंगा जल लेकर आया था। पहला वर अब भी वही राख पर सोया हुआ अपने दुःख में डूबा था। अब तीनों फिर एक ही स्थान पर एकत्र हो चुके थे। तीसरे वर ने ग्रंथ खोला और उसमें वर्णित मंत्रों का उच्चारण शुरू कर दिया। दूसरा वर गंगा के जल का प्रयोग कर रहा था और पहला वर उसी स्थान पर खड़ा था जहाँ मंदारवती की चिता थी। मंत्रों के प्रभाव से अचानक उस स्थान पर प्रकाश फैला और मंदारवती पुनर्जीवित होकर उनके सामने खड़ी हो गई। उसकी सुंदरता पहले से भी अधिक अलौकिक लग रही थी।
लेकिन समस्या यह थी कि अब तीनों में से कौन उसका पति बने। सभी अपने अपने योगदान को अधिक महत्वपूर्ण बताकर अपने-अपने अधिकार का दावा करने लगे। तीसरे ने कहा कि उसने मंत्र पढ़कर उसे जीवित किया। दूसरे ने कहा कि उसके द्वारा लाया गया पवित्र जल आवश्यक था। पहले ने दावा किया कि उसने ही मंदारवती की राख के पास पूरे प्रेम और समर्पण से समय बिताया और उसी के कारण यह सब संभव हुआ।
इस समय बेताल ने अपनी कथा समाप्त कर राजा विक्रम से प्रश्न पूछा कि मंदारवती का वास्तविक पति कौन होना चाहिए। राजा ने शांत मन से विचार किया और कहा कि मंत्रों द्वारा जीवन देने वाला उसका सृजनकर्ता समान है, इसलिए वह उसके पिता के समान हुआ। अस्थियाँ गंगा लेकर जाने वाला व्यक्ति उसके पुत्र के समान हुआ। परंतु जिसने प्रेम में डूबकर राख पर सोया, जिसने अपने मन और आत्मा से उसे अपना माना, वही उसका पति कहलाने योग्य है।
विक्रम ने इतना ही कहा था कि बेताल तुरंत उसके कंधों से उड़कर फिर उसी इमली के पेड़ पर जाकर लटक गया, और विक्रम को एक बार फिर उसे लाने के लिए लौटना पड़ा।