भाग्य की परिभाषा
एक समय की बात है, एक साधारण से गाँव में तीस वर्षीय रमेश रहता था। पूरा परिवार और पड़ोस उसके आलस्य और निष्क्रिय जीवन के लिए उसे कोसता रहता था। बचपन से ही न तो उसने पढ़ाई-लिखाई में रुचि दिखाई, न ही स्कूल नियमित जाने की कोशिश की। युवावस्था आई, पर स्थिति वही की वही रही।
न उसने कभी अपने पैरों पर खड़े होकर पैसा कमाया, न ही कोई ऐसा कौशल सीखा जिससे रोज़ी-रोटी चल सके। गाँव के प्रभावशाली या संपन्न लोगों से उसकी कोई दोस्ती या संपर्क भी नहीं था, जो उसकी सहायता कर पाते। उसकी इस दशा से परिवार का चिंतित होना स्वाभाविक था, और यह चिंता प्रतिदिन कटु फटकार, तानों और निराशा भरी निगाहों का रूप ले लेती। माँ की आँखें नम और पिता का सिर शर्म से झुका रहता।
एक दिन, इस अपमान और हताशा से तंग आकर, रमेश ने दृढ़ संकल्प लिया कि अब वह कुछ करके दिखाएगा। उसने गाँव छोड़कर अलग-अलग काम करने की ठानी। मज़दूरी, छोटी-मोटी दुकानदारी, ठेले का काम – सब कुछ आज़माया, पर कहीं भी उसका मन टिका नहीं। तभी उसकी नज़र गाँव के वृद्ध सपेरे, कल्लू मियाँ पर पड़ी। यह पेशा उसे अजीबोगरीब और आसान लगा। उसकी सोच थी – साँप तो स्वयं नाचता है, बस बीन की मधुर तान छेड़नी है। उसे लगा कि शायद यही उसके भाग्य को बदलने का मार्ग है।
उसने कल्लू मियाँ से इस विद्या की बारीकियाँ सीखनी शुरू की। साँप पकड़ने की सावधानी, उन्हें प्रशिक्षित करने का तरीका, बीन बजाने की विशेष रागिनियाँ – सब कुछ उसने लगन से सीखा। जब उसे विश्वास हो गया कि अब वह अकेला यह काम कर सकता है, तो उसने एक छोटी पर मज़बूत बाँस की टोकरी ख़रीदी, जिसका ढक्कन कसकर बंद हो सके। साथ ही एक पुरानी, पर सुरीली बीन का भी प्रबंध किया।
एक सुबह, उम्मीदों से भरा, वह जंगल की ओर चल पड़ा। पूरा दिन काँटों-झाड़ियों में, पत्थरों और खोहों में साँप की तलाश में बीत गया। शाम के सन्नाटे में, आखिरकार उसे एक लंबा, चिकना और सुंदर नाग दिखाई दिया। डर को दबाते हुए, उसने पूरी सावधानी से उसे पकड़ा और अपनी टोकरी में कैद कर लिया। सफलता की खुशी से उसका हृदय उमड़ पड़ा, भले ही शरीर थकान से चूर था। वह गाँव लौटने के लिए चल पड़ा।
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रास्ते में एक दूसरे गाँव के पास एक पुराना सामुदायिक चबूतरा था। थकान इतनी अधिक थी कि आगे कदम बढ़ाना असंभव लग रहा था। भूख भी थी, पर नींद ने सारी शक्ति हर ली थी। उसने वहीं चबूतरे पर, अपनी अनमोल टोकरी को सिरहाने रखकर, गहरी नींद में आँखें मूंद लीं।
उसी रात, चबूतरे के पास बने एक बिल से निकला एक छोटा और चंचल चूहा, टोकरी के पास आया। उसे टोकरी के भीतर से अजीब सी गंध आ रही थी। उसने अनुमान लगाया कि कोई स्वादिष्ट भोजन अंदर बंद है। अपने पैने दाँतों से उसने टोकरी के किनारे को कुतरना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे, एक छोटा सा छेद बन गया। जैसे ही छेद उसके प्रवेश के लायक हुआ, वह उत्सुकतावश अंदर घुसा। किंतु वहाँ उसका इंतज़ार कोई भोजन नहीं, बल्कि एक भूखा और बेचैन साँप कर रहा था। अवसर देखते ही साँप ने तेजी से वार किया, चूहे को अपना शिकार बना लिया और उसी छेद से होकर टोकरी से बाहर सरक गया, अंधेरी रात में खो जाने के लिए। और रमेश? वह अपने सपनों की दुनिया में गहरी नींद लेता रहा, इस घटना से बिल्कुल अनजान।
शिक्षा (Siksha): इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि केवल कठिन परिश्रम और लगन से ही सफलता मिलती है। शॉर्टकट या आसान रास्ते अक्सर विफलता की ओर ले जाते हैं।