1. गोलू और पेड़ का दोस्त (Golu aur Ped ka Dost)

गोलू अपने घर के आँगन में बड़े से आम के पेड़ के नीचे बैठकर किताब पढ़ना बहुत पसंद करता था। उसे लगता था मानो पेड़ उसका साथी हो। एक दिन, जब वह किताब पढ़ रहा था, तभी हवा का एक झोंका आया और एक सूखा पत्ता सीधे उसकी किताब पर आ गिरा। गोलू ने पत्ता हटाया तो देखा, उसके बगल में एक छोटा सा लड़का बैठा है, जो हरे रंग की शर्ट पहने था और उसके बाल भी हरे-हरे से थे।
गोलू चौंक गया। उसने पूछा, “तुम कौन हो? तुम इतने हरे क्यों हो?”
हरे लड़के ने मीठी आवाज़ में कहा, “मैं हरिया हूँ। मैं इसी पेड़ की आत्मा हूँ। मुझे तुम रोज़ किताब पढ़ाते हो, इसलिए मैं तुमसे मिलने आ गया।”
गोलू को पहले तो डर लगा, लेकिन हरिया की बातों में इतनी मिठास थी कि उसका डर जल्दी ही दोस्ती में बदल गया। अब वह रोज़ शाम को पेड़ के नीचे मिलते। हरिया गोलू को पक्षियों के बारे में बताता, बारिश के बाद ज़मीन के अंदर क्या होता है, और कैसे पेड़ एक-दूसरे से बातें करते हैं।
एक दिन गोलू ने देखा कि हरिया बहुत उदास है। उसकी हरी शर्ट फीकी पड़ गई थी। गोलू ने पूछा तो हरिया ने बताया, “तुम्हारे पड़ोसी अंकल पेड़ काटने की बात कर रहे हैं। अगर यह पेड़ गिर गया, तो मैं भी चला जाऊँगा।”
गोलू को यह बात अच्छी नहीं लगी। उसने अपने पापा को सब समझाया। पापा ने गोलू की बात सुनकर पड़ोसियों को समझाया कि यह पेड़ हवा को शुद्ध करता है, फल देता है और छाँव देता है। सबकी समझ में बात आ गई और पेड़ को न काटने का फैसला हुआ।
उस दिन शाम को हरिया फिर से चमक रहा था। उसकी शर्ट पहले से भी ज़्यादा हरी थी। उसने गोलू को गले लगाया और कहा, “तुमने मेरी जान बचा ली। अब तुम सिर्फ मेरे दोस्त नहीं, मेरे रक्षक भी हो।”
गोलू ने खुश होकर पेड़ को सहलाया। अब वह जानता था कि पेड़ सिर्फ पेड़ नहीं होते, उनकी भी एक आत्मा होती है और एक अच्छा दोस्त होना बहुत बड़ी बात है।
2. चाय वाली बुआ की चुटकी (Chai Wali Bua ki Chutki)

रिया तीसरी कक्षा में पढ़ती थी। उसे अपने स्कूल की इमारत का सबसे पुराना हिस्सा, जहाँ संगीत की क्लास होती थी, बहुत डरावना लगता था। वहाँ की दीवारें पुरानी थीं और रास्ता अंधेरा। उसे लगता था कि वहाँ कोई परछाई घूमती है। एक दिन संगीत की क्लास के बाद जब सब चले गए, रिया अपना पानी की बोतल भूल गई। जब वह वापस आई, तो उसने देखा कि एक बुआ झाड़ू लगा रही हैं। बुआ ने उसे देखा और प्यार से कहा, “बेटा, अकेले मत आया करो, अंधेरा हो जाता है।”
रिया ने कहा, “मुझे डर लगता है बुआ।”
बुआ मुस्कुराईं और बोलीं, “डरना नहीं बेटा। लो, ये चुटकी ले लो।” इतना कहकर बुआ ने रिया के गाल पर हल्का सा चुटकी काटा और गायब हो गईं। रिया की आँखें फैल गईं। वह डर के मारे वहाँ से भागी।
अगले दिन उसने अपनी दोस्त से बात की तो पता चला कि पुरानी इमारत में कोई बुआ नहीं आती। एक दादी माँ वहाँ चाय बेचती थीं, जिनका निधन कई साल पहले हो गया था। वे बच्चों से बहुत प्यार करती थीं और डरने वाले बच्चों को प्यार से चुटकी काटकर उनका डर दूर कर दिया करती थीं।
रिया को अब समझ आ गया कि वह बुआ कोई और नहीं, बल्कि चाय वाली दादी की आत्मा थीं। अगले दिन जब वह फिर से संगीत क्लास के लिए गई, तो डर तो लगा, लेकिन उसने हिम्मत की। जैसे ही उसने पुराने गलियारे में कदम रखा, उसे हल्की सी चुटकी गाल पर महसूस हुई। उसने चारों तरफ देखा, कोई नहीं था। लेकिन उसका डर पल भर में गायब हो गया।
उस दिन से रिया कभी उस गलियारे से अकेले नहीं गुज़री, लेकिन अब वह डरती नहीं थी। वह मन ही मन बुआ को धन्यवाद कहती और हाथ हिलाकर हैलो करती। उसे लगता था कि बुआ भी कहीं छुपकर उसे देख रही हैं और मुस्कुरा रही हैं। रिया ने अपने सभी दोस्तों को ये कहानी सुनाई, और अब सबको पता था कि स्कूल की पुरानी इमारत में एक प्यारी सी आत्मा रहती है, जो बच्चों की रक्षा करती है।
3. मिठू का संगीतमय सपना (Mithoo ka Sangeetmay Sapna)

मिठू को गाना बहुत पसंद था, लेकिन वह बहुत शरमाता था। जब भी वह स्टेज पर जाता, उसका गला सूख जाता। उसके दादा जी हमेशा कहते, “बेटा, संगीत को दिल से लगा, डर अपने आप दूर हो जाएगा।” एक रात, जब मिठू सो रहा था, उसने सपना देखा कि एक बुज़ुर्ग खड़े हैं। उनके हाथ में बाँसुरी थी और उनकी दाढ़ी सफेद थी। वे बहुत शांत लग रहे थे।
बुज़ुर्ग ने कहा, “बेटा मिठू, तुम संगीत को बहुत प्यार करते हो, लेकिन डर के मारे उसे बाहर नहीं आने देते। मैं उस्ताद बाँसुरीवाले हूँ। मैं तुम्हें संगीत सिखाने आया हूँ।”
मिठू ने आँखें मलीं तो बुज़ुर्ग गायब हो गए। अगली रात वह फिर आए। इस बार मिठू डरा नहीं। उसने पूछा, “आप असली हैं या सपना?” बुज़ुर्ग हँसे और बोले, “चलो, आज पहला पाठ।”
हर रात, उस्ताद जी मिठू को संगीत की बारीकियाँ सिखाते। वे उसे सुर और ताल का महत्व समझाते। कैसे साँस को कंट्रोल करना है, कैसे आवाज़ को ऊपर-नीचे ले जाना है। मिठू ने दिन में प्रैक्टिस करना शुरू कर दिया। उसकी आवाज़ में इतना मिठास आ गया कि घरवाले हैरान रह गए।
एक दिन मिठू ने पूछा, “उस्ताद जी, आप आखिर हैं कौन?” तब उस्ताद जी ने बताया, “कई साल पहले, मैं इसी शहर में रहता था। मैंने बाँसुरी से लोगों को संगीत का रास्ता दिखाया। मेरी इच्छा थी कि संगीत कभी न रुके। जब मैंने तुम्हें संगीत के लिए तड़पते देखा, तो मैं तुम्हारे पास आ गया।”
स्कूल के वार्षिक समारोह में मिठू ने पहली बार स्टेज पर गाना गाया। उसने उस्ताद जी को स्टेज के पीछे खड़ा देखा, जो उसे मुस्कुराकर देख रहे थे। मिठू ने डर को दूर भगाया और इतना मधुर गाना गाया कि सब दंग रह गए।
उस रात उस्ताद जी आखिरी बार आए। उन्होंने कहा, “मेरा काम पूरा हो गया। अब तुम संगीत को आगे बढ़ाना।” मिठू की आँखों में आँसू आ गए। उसने उस्ताद जी को प्रणाम किया। अब मिठू अकेला नहीं था, उसके अंदर उस्ताद जी की सीख हमेशा जीवित रहेगी।
4. नानी का आँगन (Nani ka Aangan)

आरव अपने मम्मी-पापा के साथ शहर से अपनी नानी के पुराने घर आ गया था। घर बहुत बड़ा था, लेकिन थोड़ा सूनापन था। नानी अब स्वर्ग में थीं। पहली रात आरव को नींद नहीं आ रही थी। वह बालकनी में गया तो देखा कि आँगन में एक छोटी लड़की झूले पर बैठी है। उसने चोटी बाँध रखी थी और बहुत प्यारी लग रही थी।
आरव नीचे उतरा और पास गया। लड़की ने कहा, “तुम नए हो? मैं गुड़िया हूँ। यह घर मेरी सहेली का था, जो बहुत प्यारी थी।”
आरव ने पूछा, “तुम्हारी सहेली कौन है?”
गुड़िया हँसी और बोली, “तुम्हारी नानी! हम दोनों साथ खेला करते थे। अब वो नहीं रही, लेकिन मैं अब भी इस घर की रखवाली करती हूँ।”
आरव को डर लगने की बजाय बहुत अच्छा लगा। गुड़िया ने उसे घर की सैर कराई। उसने बताया कि नानी को कुएँ के पास बैठकर कहानी पढ़ना कितना पसंद था। उसने बताया कि आम के पेड़ पर नानी ने अपना नाम कहाँ लिखा था। उसने बताया कि बरसात में नानी कागज़ की नाव कहाँ बहाया करती थीं।
गुड़िया के साथ आरव का समय बहुत मज़ेदार बीतता। वह उसे नानी के बचपन की हर एक बात बताती। एक दिन आरव ने पूछा, “तुम आत्मा हो, क्या तुम्हें डर नहीं लगता?”
गुड़िया ने कहा, “अच्छी आत्माओं को कभी डर नहीं लगता। मैं यहाँ इसलिए हूँ क्योंकि नानी ने मुझसे वादा किया था कि मैं इस घर की देखभाल करूँगी। वादा तोड़ना अच्छा नहीं होता ना?”
जब आरव को शहर वापस जाना था, तो वह गुड़िया से मिलने आँगन में आया। उसने कहा, “मैं जा रहा हूँ, लेकिन मैं फिर आऊँगा। तुम घर की अच्छे से देखभाल करना।”
गुड़िया ने उसे गले लगाया और कहा, “जरूर। और हाँ, तुम अपनी नानी को बताना कि उनका घर बिल्कुल सुरक्षित है।” आरव ने मुस्कुराकर हाँ कही। अब वह जानता था कि नानी का घर कभी सूना नहीं है, क्योंकि वहाँ उनकी सबसे अच्छी दोस्त रहती है।
5. बादलों का जादूगर (Badalon ka Jadoogar)

पाखी को बारिश से बहुत डर लगता था। बिजली की कड़क और तेज़ हवा उसे डरा देती थी।
एक दिन ज़ोरदार बारिश हो रही थी। पाखी खिड़की से बाहर देख रही थी। तभी उसने देखा – बादलों के बीच से एक छोटा लड़का तैरता हुआ आया। उसका शरीर हल्का-सा पारदर्शी था और वह हवा में उड़ रहा था। वह भूत था!
पाखी डर गई। लड़का खिड़की के पास आया और बोला, “डरो मत, मैं बादलों का जादूगर हूँ। मेरा नाम मेघा है।”
पाखी ने काँपती आवाज़ में पूछा, “तुम भूत हो?”
मेघा मुस्कुराया, “हाँ, लेकिन बुरा नहीं। चलो, मैं तुम्हें बारिश की अच्छाई दिखाता हूँ।”
मेघा ने पाखी का हाथ पकड़ा। उसका हाथ बर्फ जैसा ठंडा था। दोनों बादलों में उड़ गए।
ऊपर से बारिश बहुत सुंदर लग रही थी। मेघा ने अपनी जादूई छड़ी घुमाई और बारिश की बूंदें आसमान में नाचने लगीं। उसने बताया कि बारिश प्यासी धरती को पानी देती है, बीज अंकुरित करती है, नदियाँ भरती है।
पाखी ने पूछा, “तुम भूत कैसे बने?”
मेघा बोला, “मुझे बादलों से बहुत प्यार था। एक दिन बारिश में भीगते-भीगते मैं बीमार हो गया और स्वर्ग चला गया। लेकिन बादलों से दोस्ती नहीं टूटी, इसलिए मैं भूत बनकर यहाँ रह गया।”
पाखी का डर खत्म हो गया। मेघा ने उसे बारिश में कूदना सिखाया, कागज़ की नाव चलाना सिखाया।
जब बारिश रुकी, तो मेघा का शरीर धीरे-धीरे हवा में घुलने लगा। उसने कहा, “अब तुम डरती नहीं हो। बारिश की दोस्त बन गई हो।”
पाखी ने कहा, “क्या तुम फिर आओगे?”
मेघा मुस्कुराया, “हर बारिश में।” और वह बादलों में विलीन हो गया।
अब जब भी बारिश होती, पाखी खिड़की खोलकर बाहर निकलती। वह डरती नहीं थी। उसे पता था कि बादलों के पीछे, उसका दोस्त – बादलों का जादूगर भूत – उसे देख रहा है और मुस्कुरा रहा है।