सामान्यता की वापसी
एक समय की बात है, भगवान शिव गहन ध्यान में बैठे थे। अपनी समाधि के दौरान वे एक साथ कई लोकों का सृजन और संहार कर रहे थे, ताकि मानव मन ईश्वर की खोज करे और उनके प्रति समर्पण की भावना सीखे।
परंतु उनकी पत्नी माता पार्वती इस ध्यान के महत्व को नहीं समझ पाईं। लीलावश वे उनके पीछे गईं और अपनी हथेलियों से उनकी दोनों आँखें बंद कर दीं। इस कृत्य से शिव का ध्यान भंग हुआ और क्रोध में आकर उन्होंने तुरंत पार्वती को श्राप दे दिया, “तुम मनुष्य लोक में एक मानव के रूप में जन्म लो।”
तत्क्षण, पार्वती देवी भारत के एक तटीय क्षेत्र में मछुआरों के राजा की पुत्री के रूप में अवतरित हो गईं। समय बीता और पार्वती एक रूपवती युवती बन गईं। इन लगभग पच्चीस वर्षों के दौरान, भगवान शिव ने कठोर तपस्या की और अपने निर्मित व संहार किए जाने वाले लोकों का संचालन करते रहे।
शिव के वाहन नंदी बैल सारा समय शिव के समक्ष बैठे रहते थे। धीरे-धीरे उन्होंने माता पार्वती की अनुपस्थिति महसूस की। वे नहीं चाहते थे कि संसार निरंतर बनने-बिगड़ने के चक्र में फँसा रहे। उनकी इच्छा थी कि शिव और पार्वती पुनः मिलकर शांति से रहें। इसलिए नंदी उस स्थान पर पहुँचे जहाँ पार्वती रह रही थीं और समुद्र में एक विशाल एवं भयानक व्हेल मछली का रूप धारण कर लिया।
व्हेल रूपी नंदी ने अनेक मछली पकड़ने वाली नावों पर आक्रमण कर उन्हें नष्ट कर दिया। इससे मछुआरों का राजा, जो पार्वती के पिता थे, घबरा गए और उन्होंने भगवान शिव से प्रार्थना की कि वे इस व्हेल से मछुआरा समुदाय की रक्षा करें।
मछुआरों और पार्वती की प्रार्थना इतनी निश्छल और तीव्र थी कि भगवान शिव एक शिकारी के रूप में प्रकट हुए और उन्होंने व्हेल का वध कर दिया। तब व्हेल ने अपना वास्तविक रूप धारण किया और नंदी बनकर शिकारी रूपी शिव से विनती की कि वे मछुआरी के रूप में जन्मी पार्वती से विवाह करें। शीघ्र ही भव्य समारोह में शिव और पार्वती का पुनर्मिलन हुआ और संसार में दीर्घकाल तक शांति व सामंजस्य स्थापित हुआ।
शिक्षा (Siksha): इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि सृष्टि का संचालन एक सूक्ष्म एवं दिव्य संतुलन पर निर्भर करता है। अज्ञानतावश या लापरवाही से की गई छेड़छाड़ इस संतुलन को बिगाड़ सकती है, जिसके परिणामस्वरूप विपरीत परिस्थितियाँ उत्पन्न होती हैं।