दत्तात्रेय का भोजन और चमत्कार
एक गरीब ब्राह्मण दंपत्ति थे – राजा शर्मा और उनकी पत्नी सुमती। उनके अनेक संतानें हुईं, परंतु केवल दो ही जीवित बच पाईं: एक अंधा पुत्र और दूसरा लंगड़ा पुत्र।
उनके परिवार की परंपरा थी कि दोपहर में ब्राह्मण अतिथियों को भोजन कराए बिना स्वयं भोजन नहीं करते। एक दिन, जब पितृ तर्पण का दिन था, सुमती ने ब्राह्मण अतिथियों के लिए भोजन तैयार किया। किंतु उसे परोसने से पहले ही, उनके द्वार पर एक साधु ने भिक्षा माँगी।
सुमती ने उस साधु को पूर्ण तृप्ति के साथ भोजन कराया। भिक्षा पाकर साधु ने सुमती को “अम्मा” कहकर आशीर्वाद दिया। तब उसने अपना वास्तविक रूप प्रकट किया – वह स्वयं भगवान दत्तात्रेय थे, जो त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश के सम्मिलित अवतार माने जाते हैं।
दत्तात्रेय ने कृतज्ञता में सुमती से वर माँगने को कहा। सुमती ने कहा, “हे प्रभु, आपके मुख से ‘अम्मा’ शब्द सुनकर मेरा हृदय अभिभूत हो गया। मैं चाहती हूँ कि आप सदैव मुझे अम्मा ही कहते रहें।”
बाद में सुमती ने अपने पति राजा शर्मा को बताया कि ब्राह्मणों को भोजन कराए जाने और भगवान विष्णु को नैवेद्य चढ़ाए जाने से पहले ही एक साधु ने भोजन ले लिया। राजा शर्मा ने समझाया, “जिसे हमने भोजन दिया, वे स्वयं यज्ञपति दत्तात्रेय थे। अतः न तो ब्राह्मणों का अपमान हुआ और न ही भगवान विष्णु का।”
दत्तात्रेय ने सुमती की इच्छा स्वीकार कर ली। कुछ समय बाद, राजा शर्मा और सुमती के घर एक पुत्र ने जन्म लिया, जो और कोई नहीं, बल्कि उसी पूर्व अवतार में उनके घर भोजन करने आए साधु रूपी दत्तात्रेय थे। उन्होंने बालक का नाम श्रीपाद रखा।
श्रीपाद बड़े हुए और वेदों में निपुण हो गए। अपने योगबल से उन्होंने जान लिया कि अब उन्हें गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करने का समय आ गया है। उन्होंने माता-पिता को बताया, “मेरी अर्धांगिनी योगश्री मेरी प्रतीक्षा कर रही हैं। मुझे गृह त्याग कर अपने संसारिक कर्तव्यों का पालन करना है।”
सुमती निराश हो गईं कि अब उनका “सदैव अम्मा कहलाने” का वर पूरा नहीं होगा। तब श्रीपाद ने अपने दोनों बड़े भाइयों को स्पर्श किया। उनके स्पर्श मात्र से बड़े भाई की दृष्टि लौट आई और दूसरे भाई का पैर ठीक हो गया। अब दोनों भाई सुमती को “अम्मा” कहकर पुकारने लगे। इस प्रकार, सुमती की इच्छा सदा के लिए पूरी हो गई।
शीघ्र ही सुमती को अपनी भूल का आभास हुआ कि उन्होंने श्रीपाद को उनके लौकिक कर्तव्यों से रोकने का प्रयास किया था। दत्तात्रेय को तो संसार में और कल्याणकारी कार्य करने थे। सुमती ने क्षमा माँगी, “हे पुत्र, मैंने तुम्हें केवल एक पुत्र के रूप में ही समझा।” तब श्रीपाद ने उन्हें अपना विराट रूप दिखाया और उन्हें सायुज्य मुक्ति प्रदान की। इसके पश्चात श्रीपाद दत्तात्रेय काशी, बद्रीनाथ और गोकर्ण की यात्रा पर निकल पड़े, जहाँ शंकर भगवान की पूजा होती है।
शिक्षा: ईश्वर सबसे पहले हृदय की शुद्धता देखते हैं, रीति-रिवाजों की कठोरता नहीं।