खतरे की सही पहचान - Signs of Danger

खतरे की सही पहचान – Signs of Danger

नैतिक कहानियाँ

खतरे की सही पहचान

एक समय की बात है। एक विशाल वृक्ष की शाखा पर बने घोंसले में चार छोटी-छोटी चिड़ियाँ अपनी माँ के साथ रहती थीं। चूजे अभी नन्हे थे और स्वयं उड़ नहीं सकते थे। माँ चिड़िया हर शाम उनके लिए दाने लाती और उन्हें खिलाती। पूरा दिन चूजे बस यही आस लगाए, अपनी माँ के लौटने का इंतज़ार करते रहते।

एक दिन जब माँ चिड़िया बाहर गई हुई थी, तभी चूजों ने नीचे खड़े एक आदमी की आवाज़ सुनी। वह अपने भाई से कह रहा था कि इस पेड़ को काट देना चाहिए। शाम को जैसे ही माँ लौटी और उन्हें खिलाया, चूजे जोर-जोर से चीखने लगे और उन्होंने माँ को सारी बात बताई। उन्होंने कहा कि कल ही उस आदमी का भाई कुछ लोगों के साथ आकर पेड़ काट देगा। इस पर माँ चिड़िया ने उत्तर दिया, “कुछ नहीं होगा, चिंता मत करो।” माँ की बात सच साबित हुई। अगले दिन पेड़ के साथ कुछ नहीं हुआ। वह भाई न तो आया और न ही पेड़ कटा। इसलिए, शाम को माँ के लौटने पर चूजे खुशी से चहक उठे।

तीन-चार दिन तक कोई पेड़ काटने नहीं आया और चूजे बेफिक्र हो गए, क्योंकि उन्हें भरपेट भोजन मिल रहा था और उनके निवास में कोई खलल नहीं डाल रहा था। फिर एक दिन, उन्होंने उसी आदमी की आवाज़ फिर से सुनी, लेकिन इस बार वह अपने भाई से नहीं, बल्कि अपने बेटे से ज़ोर-ज़ोर से बात कर रहा था। वह कह रहा था कि उसके भाई ने उसका साथ नहीं दिया और पेड़ नहीं काटा। आदमी अपने बेटे से कह रहा था कि वह किसी को बुलाकर पेड़ कटवा दे।

भयभीत चूजे फिर शाम को माँ के लौटते ही रोने लगे और बोले कि इस बार तो कल उसका बेटा ज़रूर किसी को लेकर आएगा और पेड़ काट देगा। माँ ने फिर उनकी कहानी सुनी और कहा, “कुछ नहीं होगा।” उसकी बात फिर सच निकली। अगले दिन न तो बेटा आया और न ही पेड़ कटा। चूजों को विश्वास हो गया कि कोई भी उनके पेड़ को कभी नहीं काटेगा और न ही उनके घोंसले को नुकसान पहुँचाएगा।

एक सप्ताह बीत गया। एक दिन माँ हमेशा की तरह शाम को लौटी। चूजे इस बार न तो रो रहे थे और न ही पहले की तरह भयभीत थे। उन्होंने बस अपनी माँ को सूचना देते हुए कहा कि वह आदमी फिर अपने बेटे के साथ आया था और इस बार उसने अपने बेटे को पेड़ न कटवाने के लिए डाँटा था। उसने कहा था कि अब वह खुद ही इसे काट देगा। चूजों ने जल्दी से यह भी जोड़ा कि अब वे चिंतित नहीं हैं, क्योंकि पहले दो बार जैसे कुछ नहीं हुआ था, वैसे ही इस बार भी कुछ नहीं होगा।

हालाँकि, माँ चिड़िया ने सचेत किया, “असली खतरा तब होता है जब इंसान खुद कार्य करने का निर्णय लेता है।” माँ ने अपने बच्चों को सिखाया, “जब इंसान अपने भाई, बेटे या अन्य रिश्तेदारों पर निर्भर करता है, तो काम अक्सर नहीं हो पाते। लेकिन जब वह स्वयं किसी कार्य के लिए दृढ़ संकल्प ले लेता है, तो यह असली खतरे का संकेत होता है।” यह कहकर, माँ ने चूजों को खिलाया और फिर उसी रात एक-एक करके उन्हें एक सुरक्षित स्थान पर ले जाना शुरू कर दिया।

माँ की बात सच साबित हुई। अगले ही दिन पेड़ काट दिया गया और घोंसला नष्ट हो गया।

शिक्षा: इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि खतरे के संकेतों को पहचानना और उनकी गंभीरता को समझना बहुत ज़रूरी है। दूसरों पर निर्भर व्यक्ति के वादे अक्सर खोखले होते हैं, लेकिन जब कोई स्वयं कार्य करने की ठान ले, तो उसकी योजना को गंभीरता से लेना चाहिए।

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