एकता में ही बल है
एक समय की बात है, एक बूढ़े पिता थे और उनके चार पुत्र थे। चारों पुत्र अब युवावस्था में आ चुके थे। हर कोई बीस के दशक में था और दुनिया को जीतने के लिए तैयार था। वे सभी शिक्षित थे, पर समस्या यह थी कि वे आपस में एक दिल नहीं थे। हर कोई दूसरे की परवाह किए बिना, अकेले ही दुनिया में अपना रास्ता बनाना चाहता था। पिता को अपने बेटों की यह फूट और अहंकार देखकर बहुत चिंता हुई। उन्होंने उन्हें एक सबक सिखाने का निश्चय किया।
एक दिन उन्होंने चार लकड़ियाँ लीं और उन्हें एक मज़बूत धागे से कसकर बाँध दिया। फिर उन्होंने अपने चारों पुत्रों को बुलाया। सबसे पहले उन्होंने बंधी हुई चारों लकड़ियाँ बड़े बेटे को दीं और कहा, “इन चारों लकड़ियों को तोड़ दो, पर ध्यान रहे, बाँधने वाला धागा खोलना नहीं है।” बड़े बेटे को अपनी शारीरिक ताकत पर बहुत गर्व था। उसने पूरी शक्ति लगाई, पर वह बंधी हुई लकड़ियों को तोड़ नहीं पाया। उसका सिर शर्म से झुक गया।
तब पिता ने वही लकड़ियाँ दूसरे बेटे को दीं। दूसरा बेटा स्वयं को चारों में सबसे अधिक बुद्धिमान मानता था। उसने हर तरह की युक्ति लगाई, कोण से दबाव डाला, लेकिन बुद्धि भी उन एकजुट लकड़ियों के आगे बेकार साबित हुई। वह भी असफल रहा।
अब बारी थी तीसरे बेटे की, जो स्वयं को सबसे रचनात्मक समझता था। उसने कल्पनाशील तरीके आज़माए, लकड़ियों को घिसने की कोशिश की, पर उसकी रचनात्मकता भी उस समूह के सामने टिक नहीं पाई। चारों बंधी लकड़ियाँ अटूट बनी रहीं।
अंत में, पिता ने लकड़ियाँ चौथे बेटे को दीं, जो स्वयं को ‘प्रबंधन विशेषज्ञ’ कहलाने पर गर्व करता था। उसने कार्य-योजना बनाई, समय प्रबंधन किया, लेकिन प्रबंधन का हुनर भी तब काम नहीं आया, जब चीज़ें एक साथ मज़बूती से बंधी हुई थीं। वह भी हार मानने को विवश हो गया।
चारों पुत्र अब हैरान और उत्सुक थे। तब पिता ने शांतिपूर्वक धागे की गाँठ खोल दी और चारों अलग-अलग लकड़ियाँ चारों भाइयों में बाँट दीं। अब तो हर एक लकड़ी आसानी से, एक ही प्रयास में टूट गई। वे अब नाज़ुक और भंगुर थीं।
इस दृश्य को देखकर चारों पुत्रों की आँखें खुल गईं। बड़े बेटे ने सबसे पहले आवाज़ उठाई, “पिताजी, अब हम समझ गए। जब तक हम चारों एक साथ बंधे रहे, कोई भी हमें तोड़ नहीं सका। पर अलग-अलग होते ही, हम में से हर एक आसानी से टूट गया।”
दूसरे बेटे ने कहा, “हाँ, अकेली बुद्धि, अकेली ताकत, कुछ नहीं कर पाती।”
तीसरे ने कहा, “रचनात्मकता भी तब तक अधूरी है, जब तक उसे दूसरे के सहारे का बल न मिले।”
चौथे बेटे ने निष्कर्ष दिया, “सच्चा प्रबंधन तो यही है कि हम सबकी शक्तियाँ एक साथ आएँ।”
पिता मुस्कुराए। उनकी चिंता दूर हो गई थी। उन्होंने समझाया, “बेटों, जीवन की चुनौतियाँ वे चार लकड़ियाँ हैं। अगर तुम अलग-अलग रहोगे, तो हर कोई तुम्हें तोड़ सकता है। लेकिन अगर तुम्हारी ताकत, तुम्हारी बुद्धि, तुम्हारी रचनात्मकता और तुम्हारा प्रबंधन एकजुट हो जाए, तो दुनिया की कोई भी ताक़त तुम्हें हरा नहीं सकती। ‘एकता में ही बल है’ – यह कोई कहावत नहीं, यह ज़िंदगी का सत्य है।”
उस दिन से चारों भाई एक दिल हो गए। उन्होंने मिलकर काम किया और परिवार का नाम रोशन किया। पिता का साधारण-सा प्रयोग उनके लिए जीवन भर का महान पाठ बन गया।
शिक्षा: एकता अजेय शक्ति है।