मेहनती चींटी और आलसी कीड़ा
हरे-भरे जंगल के किनारे एक छोटा सा मैदान था, जहाँ छोटे-बड़े कई तरह के जीव रहते थे। सुबह होते ही इस मैदान की मिट्टी से हल्की भाप उठती थी, पेड़ों की पत्तियाँ ओस से चमकती थीं और हवा में मिट्टी की ताज़गी घुली रहती थी। इस सुंदर वातावरण में सबसे अधिक सक्रिय दिखाई देती थी मेहनती चींटी तारा। वह सुबह की पहली किरण के साथ बाहर निकल आती, अपने छोटे-छोटे पैरों से तेज़ी से दौड़ती, काम ढूँढती और चेहरे पर हमेशा एक संतोष भरी मुस्कान रहती। तारा जानती थी कि जीवन में मेहनत ही आगे बढ़ाती है।
इसी मैदान में एक और जीव रहता था – आलसी कीड़ा गोपू। गोपू लंबा और मुलायम कीड़ा था, जिसके शरीर का रंग हल्का भूरा और आंखें हमेशा सुस्त रहती थीं। उसे अपने शरीर को गर्म मिट्टी पर फैलाकर धूप सेंकना, पत्तियों को सिर पर रखकर झपकी लेना और बिना उद्देश्य के जमीन पर लोट-पोट होना बहुत पसंद था। वह मानता था कि जीवन का असली आनंद आराम में है, काम में नहीं।
तारा हर सुबह गोपू के पास से निकलती और कहती,
“गोपू, आज फिर तुम लेटे हो? थोड़ी मेहनत कर लो, आगे मौसम बदल जाएगा।”
गोपू हमेशा वही जवाब देता,
“अरे तारा, तुम तो बिना बात की चिंता करती हो। जिंदगी एक ही बार मिलती है, उसे आराम से जीना चाहिए। काम का क्या है, बाद में भी हो सकता है।”
तारा हमेशा हल्की हँसी के साथ उसे देखती, लेकिन उसके मन में चिंता बढ़ती जा रही थी, क्योंकि सर्दियों और बारिश का मौसम आने वाला था। वह जानती थी कि उस मौसम में खाना ढूँढना कठिन हो जाता है।
तारा रोज सुबह जंगल के अंदर जाती, गिरा हुआ दाना खोजती, कभी पके फल का टुकड़ा खींचकर घर तक लाती, तो कभी सूखे पत्ते इकट्ठा करती। उसके छोटे शरीर के लिए यह काम बहुत कठिन था, लेकिन उसकी हिम्मत और मेहनत इतनी मजबूत थी कि वह कभी रुकती नहीं थी।
कई बार गोपू उसे भारी दाना उठाते देख कर मज़ाक करता,
“तारा! तुम तो पूरी जिंदगी इसी में काट दोगी। कभी आराम करने का मन नहीं करता?”
तारा कहती,
“गोपू, अगर आज मेहनत नहीं करूँगी तो कल मुश्किल में पड़ जाऊँगी। मेरे परिवार को भी तो खाना चाहिए। और तुम भी कभी मेरी सलाह मानो, अपने लिए कुछ जमा कर लो।”
लेकिन गोपू हमेशा सीना तानकर कहता,
“मैं कीड़ा हूँ तारा! मुझे ज्यादा खाना नहीं चाहिए। जब भूख लगेगी, जमीन में से कुछ खा लूँगा। तुम चाहो तो अपनी सुबह मेरी तरह आराम से बिताया करो।”
तारा सिर हिलाती और अपने काम में लग जाती।
दिन बीतते गए। मौसम धीरे-धीरे बदलने लगा। जंगल के पत्तों पर नमी बढ़ने लगी, हवा में ठंडक घुलने लगी और बादल अक्सर आसमान में मंडराने लगे। जंगल के बुद्धिमान जीव आपस में बातचीत करने लगे कि बारिश जल्द ही शुरू होने वाली है।
एक दिन सुबह-सुबह आसमान में काले बादल छा गए। हवा जोर से चलने लगी। पत्तों की सरसराहट सुनकर छोटे जीव भी परेशान हो गए। इसी बीच एक बूढ़ा टिड्डा चिल्लाया,
“सब लोग ध्यान दो! तेज बारिश आने वाली है। जल्दी-जल्दी अपने घर मजबूत कर लो!”
तारा ने यह सुना, और वह पहले से भी तेज़ काम करने लगी। उसने अपने घर का हर छोटा छेद बंद किया, दानों का ढेर व्यवस्थित किया, और प्रवेश द्वार के पास पत्तों की मोटी परत लगा दी ताकि बारिश का पानी अंदर न आए।
लेकिन गोपू?
वह अब भी मिट्टी पर लेटा धूप ढूँढ रहा था।
वह बोला,
“अरे, इतनी जल्दी परेशान क्यों होना? थोड़ी बारिश तो जंगल को सुंदर बनाती है। सब ठीक रहेगा।”
तारा ने समझाया,
“गोपू, ये हल्की बारिश नहीं है। बहुत तेज़ बारिश होगी। कृपया अपना घर बना लो और थोड़ी-बहुत चीजें जमा कर लो।”
गोपू ने आंखें घुमाते हुए कहा,
“तारा! मैं कीड़ा हूँ। मेरा घर तो मिट्टी में ही है। और खाना तो हर जगह मिलता है। तुम बेकार की टेंशन लेती हो।”
तारा कुछ कहना चाहती थी, लेकिन बारिश की पहली हल्की बूंदें गिरने लगीं। वह तुरंत अपने घर चली गई।
कुछ ही मिनटों में बूंदें तेज़ बारिश में बदल गईं। आसमान गरजने लगा, बादल बिजली की तरह चीखे और हवा तेज़ी से चलने लगी। बारिश का पानी मिट्टी को बहाने लगा, छोटे-छोटे जीव अपने घरों में घुस गए। हर तरफ हलचल मच गई।
गोपू को समझ आ गया कि वह मुसीबत में है।
उसने डरकर कहा,
“अरे! ये तो बहुत तेज़ बारिश है! अब मैं कहाँ जाऊँ? मेरा घर तो मिट्टी में है और वह भी बह रहा है। मैं क्या करूँ?”
पानी बढ़ता गया। गोपू की जगह मिटने लगी। वह कीचड़ में फँस गया। ठंड उसके शरीर में घुसने लगी। भूख से उसका सिर चकराने लगा।
उसे तारा के शब्द याद आए,
“आज मेहनत करोगे तो कल आराम मिलेगा।”
गोपू की आंखों में पछतावा भर गया। वह किसी तरह खुद को घसीटते हुए तारा के घर की ओर ले गया। भारी बारिश की वजह से हर इंच चलना मुश्किल था। पूरी ताकत लगाकर वह तारा के दरवाजे तक पहुँचा और कमजोर आवाज़ में बोला,
“ता… तारा… मेरी मदद करो… मैं बहुत मुश्किल में हूँ…”
तारा ने दरवाज़ा खोलकर उसे देखा। वह पूरा भीगा हुआ, ठंड से कांपता और आधा कीचड़ में डूबा था।
तारा ने बिना देर किए कहा,
“अंदर आओ गोपू! जल्दी!”
उसने पत्तों से उसे साफ किया, सूखे पत्तों से ढका और उसे गर्मी देने की कोशिश की। तारा ने उसे थोड़ा खाना भी दिया क्योंकि गोपू की हालत बहुत खराब थी।
कुछ देर बाद गोपू ने धीमी आवाज़ में कहा,
“तारा… मैं गलत था। तुम हमेशा सही थीं। मेहनत जरूरी है… मैंने कभी सोचा ही नहीं कि आराम में जिंदगी कट जाएगी। अगर तुम मुझे न बचातीं, तो मैं मर जाता।”
तारा ने नरमी से कहा,
“गोपू, गलती किसी से भी हो सकती है। लेकिन उससे सीखना जरूरी है। तुम अब सुरक्षित हो।”
बारिश कई दिनों तक चलती रही। इस दौरान गोपू तारा के घर में रहा। तारा ने उसकी खूब देखभाल की और उसे समझाया कि जीवन में मेहनत क्यों जरूरी है।
बरसात खत्म होने के बाद, जब सूरज निकला और जंगल फिर से चमका, गोपू बाहर निकला। इस बार उसके चेहरे पर सुस्ती नहीं, बल्कि इच्छाशक्ति थी।
उसने पहली बार खुद काम करना शुरू किया। उसने दाने उठाए, छोटी टहनियाँ इकठ्ठा कीं, और अपना घर बनाने लगा। कई बार वह थक गया, कई बार उसका मन हार गया, लेकिन तारा की सीख उसे आगे बढ़ाती रही।
कुछ हफ्तों बाद गोपू का घर भी बन गया। उसके पास अब खाने का भंडार था, और एक सुरक्षित जगह भी। उसने तारा को धन्यवाद देते हुए कहा,
“तारा, तुमने मुझे सिखाया कि मेहनत करने वाला ही दुनिया में सच्चा मजबूत होता है। अब मैं भी मेहनत करूँगा और कभी पुराने गोपू जैसा नहीं बनूँगा।”
धीरे-धीरे जंगल में खबर फैल गई कि गोपू अब आलसी नहीं रहा। अब छोटे जीव भी उससे मेहनत और तैयारी का महत्व सीखने आने लगे।
गोपू हर किसी से कहता,
“आलस इंसान को कमजोर बनाता है, और मेहनत उसे मजबूत करती है।”
और इस तरह तारा और गोपू की दोस्ती पूरे जंगल में एक मिसाल बन गई। दोनों ने मिलकर एक ऐसा जीवन बनाया जहाँ मेहनत, जिम्मेदारी और दोस्ती हमेशा सबसे ऊपर रहे।
अंत में जंगल के सभी जानवरों ने यही सीखा कि
“मेहनत कभी बेकार नहीं जाती, और आलस हमेशा नुकसान देता है।”