(Jonathan Swift की अमर कृति पर आधारित हिंदी कहानी)
परिचय
बहुत समय पहले इंग्लैंड में लेमुएल गुलिवर नाम का एक युवक रहता था। उसने चिकित्सा (दवा) की पढ़ाई की थी, लेकिन उसे डॉक्टरी पेशे में ज्यादा सफलता नहीं मिली। गुलिवर को समुद्र की सैर और नई-नई जगहों को देखने का बहुत शौक था। वह बार-बार समुद्री यात्राओं पर जाता और दूर-दराज के देशों की यात्रा करता। उसकी यही आदत उसे कभी छोटे-छोटे लोगों के देश में ले जाती है, तो कभी विशालकाय लोगों के देश में। आइए, गुलिवर की इन्हीं रोमांचक यात्राओं की कहानी पढ़ते हैं।
भाग 1: लिलिपुट – अंगूठे जितने लोगों का देश
गुलिवर एक जहाज़ पर डॉक्टर के रूप में काम कर रहा था। अचानक समुद्र में भयंकर तूफान आ गया। जहाज़ टूटकर चट्टानों से टकरा गया। गुलिवर तैरकर किसी अनजान द्वीप के किनारे पहुँचा। थकान के कारण वह वहीं सो गया।
जब उसकी नींद खुली, तो उसने देखा कि उसके हाथ-पैर ज़मीन से बंधे हुए हैं। सूरज की रोशनी में उसने महसूस किया कि उसके शरीर पर कुछ रेंग रहा है। उसने आँखें फाड़कर देखा तो हैरान रह गया। उसके शरीर पर छह इंच (लगभग अंगूठे जितने) लंबे मनुष्य चढ़ रहे थे! उनके हाथों में छोटे-छोटे धनुष-बाण थे।
गुलिवर इतना चौंका कि वह ज़ोर से चिल्ला उठा। उसकी आवाज़ सुनकर सभी छोटे मनुष्य डर के मारे इधर-उधर भागने लगे। लेकिन जब गुलिवर ने अपनी रस्सियाँ तोड़ने की कोशिश की, तो उन्होंने उस पर तीरों की बौछार कर दी। तीरों की चुभन से गुलिवर चीख उठा। जब वह शांत हो गया, तो तीर बरसाना बंद कर दिया गया।
धीरे-धीरे वहाँ सैकड़ों छोटे मनुष्य इकट्ठा हो गए। उन्होंने गुलिवर के करीब एक छोटा-सा मंच बनाया। एक व्यक्ति ने बहुत लंबा भाषण दिया, जिसे गुलिवर कुछ नहीं समझा। उसने भूख और प्यास के संकेत किए। तब सीढ़ियाँ लगाकर उन्होंने उसके मुँह में मांस और पानी के बालूत डाले।
उस देश का नाम था लिलिपुट और वहाँ के लोग लिलिपुटियन कहलाते थे। वे सभी छह इंच से अधिक लंबे नहीं थे। उनका सम्राट गुलिवर की दया और विनम्रता से बहुत प्रभावित हुआ। उसने गुलिवर को एक बड़े मंदिर में रहने की व्यवस्था दी और उसे अपनी भाषा सिखाने के लिए विद्वान लोग नियुक्त किए।
गुलिवर ने धीरे-धीरे उनकी भाषा सीख ली। उसने देखा कि लिलिपुट के लोग बात-बात पर झगड़ते थे। एक बड़ा विवाद था – अंडे को किस तरफ से तोड़ा जाए, बड़े सिरे से या छोटे सिरे से? इसी छोटी-सी बात पर दो गुट बंटे हुए थे। कुछ लोग बड़े सिरे से तोड़ने वाले थे और कुछ छोटे सिरे से तोड़ने वाले। यह झगड़ा इतना बढ़ा कि देश के दो हिस्से हो गए।
लिलिपुट और पड़ोसी देश ब्लेफुस्कु के बीच भी यही विवाद था। युद्ध छिड़ा हुआ था। गुलिवर ने सम्राट से कहा कि वह ब्लेफुस्कु के जहाजों को पकड़कर लाने में मदद कर सकता है। सम्राट मान गया। गुलिवर ने समुद्र में जाकर ब्लेफुस्कु के सारे जहाज़ों को रस्सियों से बाँधकर लिलिपुट के किनारे खींच लिया। यह देखकर सम्राट बहुत प्रसन्न हुआ।
लेकिन जल्द ही गुलिवर को पता चला कि लिलिपुट के कुछ दरबारी उसके खिलाफ साजिश रच रहे हैं। उन्होंने सम्राट से कहा कि गुलिवर को मौत की सजा दी जाए, क्योंकि वह बहुत खतरनाक है। सम्राट ने यह प्रस्ताव ठुकरा दिया, लेकिन गुलिवर समझ गया कि अब यहाँ रहना सुरक्षित नहीं है।
गुलिवर ब्लेफुस्कु चला गया। वहाँ के सम्राट ने उसका स्वागत किया। कुछ दिनों बाद गुलिवर ने समुद्र में एक अंग्रेज़ जहाज़ देखा। उसने संकेत किए और जहाज़ वालों ने उसे बचा लिया। इस तरह गुलिवर अपने घर वापस लौट आया।
प्रेरणादायक पंक्ति: “छोटा कद कोई कमी नहीं है, लेकिन छोटी सोच, झूठा घमंड और बुरी आदतें इंसान को सच में तुच्छ बना देती हैं।”
भाग 2: ब्रॉब्डिंगनेग – दिग्गजों का देश

दो महीने घर रहने के बाद गुलिवर फिर समुद्र की सैर पर निकला। इस बार उसका जहाज़ भारत जा रहा था, लेकिन तूफान के कारण जहाज़ एक अनजान द्वीप के किनारे जा लगा। गुलिवर पानी की तलाश में किनारे पर उतरा। जब वह वापस लौटा, तो उसके साथी नाव लेकर चले गए थे। गुलिवर अकेला रह गया।
वहाँ के लोग साठ फुट लंबे थे! यहाँ गुलिवर बिल्कुल गुड़िया या चूहे जैसा लगता था। उस देश का नाम था ब्रॉब्डिंगनेग और वहाँ के लोग ब्रॉब्डिंगनेगियन कहलाते थे।
शुरू में गुलिवर बहुत डर गया, लेकिन यहाँ के लोग लिलिपुटियनों से बिल्कुल अलग थे। वे दयालु और मेहमाननवाज़ थे। एक किसान ने गुलिवर को पकड़ लिया और उसे एक दुर्लभ प्राणी समझकर मेलों में घुमाने लगा। गुलिवर को दिन-रात लोगों के सामने नचाया जाता था। वह इतना थक गया कि बीमार पड़ गया।
तब रानी ने गुलिवर को खरीद लिया और उसे महल में रखा। राजा और रानी ने उसके साथ अच्छा व्यवहार किया। एक दिन गुलिवर ने राजा को इंग्लैंड की राजनीति, कानून और युद्धों के बारे में बताना शुरू किया। उसने बताया कि कैसे लोग एक-दूसरे को धोखा देते हैं, कैसे युद्ध होते हैं, और कैसे गरीब लोग पीड़ित होते हैं।
राजा यह सब सुनकर स्तब्ध रह गया। उसने गुलिवर से कहा – “तुम जैसे छोटे-से जीव के मन में इतनी हिंसा, धोखेबाज़ी और क्रूरता कैसे आ सकती है? तुम्हारे देश का इतिहास तो केवल लूट-खसोट और झूठ की कहानी लगता है।”
गुलिवर को समझ में आ गया कि सच्ची महानता शरीर के आकार से नहीं, बल्कि दिल और दिमाग से होती है। ब्रॉब्डिंगनेग के लोग शरीर से ही नहीं, बल्कि मानसिक और नैतिक रूप से भी विशाल थे। उनमें लिलिपुटियों जैसी द्वेष, ईर्ष्या और पाखंड नहीं था।
एक दिन गुलिवर समुद्र के किनारे एक बक्से में बैठा था। अचानक एक विशालकाय चील ने उस बक्से को अपनी चोंच में उठा लिया और आकाश में उड़ गई। थोड़ी देर बाद चील ने बक्से को समुद्र में गिरा दिया। गुलिवर को लगा कि अब वह मर जाएगा, लेकिन तभी एक अंग्रेज़ जहाज़ ने उसे देख लिया। नाविकों ने उसे बचा लिया और वह सुरक्षित इंग्लैंड लौट आया।
प्रेरणादायक पंक्ति: “सच्ची ऊँचाई कद से नहीं, संस्कारों और सोच से मापी जाती है। बड़ा वही है, जिसका दिल बड़ा हो।”
भाग 3: लपुटा – उड़ता हुआ द्वीप और बेकार विज्ञान

कुछ समय बाद गुलिवर फिर से समुद्री यात्रा पर निकला। इस बार समुद्री लुटेरों ने उसके जहाज़ पर हमला कर दिया। उन्होंने गुलिवर को एक छोटी-सी नाव में बैठाकर समुद्र में छोड़ दिया। कई दिनों तक भटकने के बाद गुलिवर ने आकाश में एक अजीब चीज़ देखी – एक उड़ता हुआ द्वीप!
उस द्वीप का नाम था लपुटा। यहाँ के लोगों के सिर हमेशा एक तरफ झुके रहते थे। उनकी एक आँख अंदर की तरफ और दूसरी आकाश की तरफ लगी होती थी। वे हमेशा गहरे विचारों में डूबे रहते थे। उन्हें गणित और विज्ञान से बहुत प्रेम था, लेकिन यह प्रेम उन्हें पागलपन की हद तक ले गया था।
गुलिवर ने देखा कि वहाँ के लोग इतने अमूर्त (abstract) विचारों में खोए रहते थे कि वे अपने आसपास की दुनिया को भूल गए थे। उनके घर टेढ़े-मेढ़े थे और खेत बंजर पड़े थे। एक दर्ज़ी ने गुलिवर के कपड़े बनाने के लिए उसके शरीर की बहुत सटीक माप ली, लेकिन कपड़े इतने ढीले-ढाले बने कि वे बिल्कुल फिट नहीं आए। कारण? दर्ज़ी ने गणित के फार्मूले में गलती कर दी थी!
लपुटा के वैज्ञानिक अजीब-अजीब प्रयोगों में लगे रहते थे। कोई खीरे से धूप निकालने की कोशिश कर रहा था, कोई मकान को उल्टा बनाने का तरीका खोज रहा था। उनके पास इतना ज्ञान था, लेकिन वह व्यावहारिक जीवन के किसी काम का नहीं था।
गुलिवर ने वहाँ के राजा के बारे में भी जाना। राजा नीचे की ज़मीन पर रहने वाले लोगों पर अत्याचार करता था। अगर कोई गाँव विद्रोह करता, तो राजा अपना उड़ता हुआ द्वीप उस गाँव पर गिरा देता था, जिससे सब कुचलकर मर जाते थे।
गुलिवर वहाँ से लग्नाग नामक देश गया। वहाँ के लोग अमर थे, यानी वे कभी नहीं मरते थे। पहले तो गुलिवर बहुत खुश हुआ, लेकिन जब उसने उन बूढ़े अमर लोगों को देखा, तो उसे बहुत दुख हुआ। वे इतने कमज़ोर, बीमार और बेबस हो चुके थे कि वे खुद को मरने की दुआ देते थे। उनकी आँखें नहीं देखती थीं, कान नहीं सुनते थे, दाँत नहीं थे। वे जीवन से ऊब चुके थे, लेकिन मर नहीं सकते थे।
गुलिवर समझ गया कि बिना अच्छे स्वास्थ्य और खुशी के अमरता भी एक अभिशाप है।
अंत में गुलिवर एक डच जहाज़ में सवार होकर इंग्लैंड लौट आया।
प्रेरणादायक पंक्ति: “ज्ञान तब तक बेकार है, जब तक वह जीवन को बेहतर न बनाए। विज्ञान का असली उद्देश्य मानवता की सेवा है, न कि उल्टे-सीधे प्रयोग।”
भाग 4: ह्वेनह्नम्स का देश – घोड़े जो इंसानों से बेहतर थे

गुलिवर ने एक बार फिर समुद्री यात्रा की। इस बार वह स्वयं एक जहाज़ का कप्तान बना। लेकिन उसके नाविक बदमाश निकले। उन्होंने गुलिवर के खिलाफ विद्रोह कर दिया और उसे एक नाव में बैठाकर एक सुनसान द्वीप पर छोड़ दिया।
जब गुलिवर उस द्वीप पर घूम रहा था, तो उसने कुछ अजीब जानवर देखे। वे दिखने में बिल्कुल इंसानों जैसे थे – दो हाथ, दो पैर, चेहरा, बाल – लेकिन वे बेहद गंदे, बदबूदार और जंगली थे। वे सड़ा हुआ मांस और कूड़ा-करकट खाते थे, हमेशा लड़ते-झगड़ते रहते थे, और उनमें कोई समझदारी नहीं थी। उन्हें याहू कहा जाता था।
अचानक कुछ घोड़े वहाँ आए। जैसे ही घोड़ों को देखा, याहू डरकर भाग गए। गुलिवर हैरान रह गया। उसने देखा कि वे घोड़े बहुत बुद्धिमान, शांत और व्यवस्थित थे। वे आपस में बात कर रहे थे – एक भाषा में! उस देश का नाम था ह्वेनह्नम्स (उच्चारण: ह्वेनिम्स) और वे घोड़े ही वहाँ के सबसे सम्मानित नागरिक थे।
ह्वेनह्नम्स बिल्कुल तर्कशील और नैतिक थे। उनका जीवन सादगी, सच्चाई और प्रेम पर आधारित था। वे झूठ नहीं बोलते थे, चोरी नहीं करते थे, लड़ाई नहीं करते थे। उनका खाना सादा और शाकाहारी था। उनके पास कोई कानून नहीं था, क्योंकि उन्हें किसी कानून की ज़रूरत ही नहीं थी। वे स्वभाव से ही ईमानदार थे।
गुलिवर को वहाँ रहना बहुत अच्छा लगा। उसने घोड़ों से उनकी भाषा सीखी और उन्हें अपनी दुनिया के बारे में बताया। लेकिन ह्वेनह्नम्स उसे एक याहू ही मानते थे – क्योंकि वह दिखने में याहू जैसा ही था। उन्होंने गुलिवर से कहा, “तुम्हारे शरीर में याहू के सभी लक्षण हैं, लेकिन तुममें थोड़ी बुद्धि है। फिर भी, तुम हमारे समाज के लिए खतरा हो सकते हो।”
गुलिवर को बहुत शर्म आई। उसने महसूस किया कि इंसान अक्सर घमंड, लालच, झूठ और बुराइयों में डूबा रहता है। वे युद्ध करते हैं, एक-दूसरे को धोखा देते हैं, पर्यावरण को नष्ट करते हैं, और दूसरों को पीड़ा देते हैं। जबकि ये घोड़े – जिन्हें हम “पशु” समझते हैं – असली इंसानियत का उदाहरण थे।
ह्वेनह्नम्स की विधानसभा ने फैसला सुनाया कि गुलिवर एक याहू है, इसलिए उसे या तो याहू के साथ रहना चाहिए या फिर इस देश से चले जाना चाहिए। गुलिवर बहुत दुखी हुआ, लेकिन उसे जाना ही पड़ा।
उसने एक पुर्तगाली जहाज़ में सवार होकर इंग्लैंड वापसी की। लेकिन अब वह पहले जैसा नहीं रहा। उसे इंसानों से चिढ़ हो गई थी। वह अपना अधिकांश समय घोड़ों के साथ बिताने लगा और लोगों से दूर रहने लगा। उसने अपने परिवार और दोस्तों को भी ठुकरा दिया। वह चाहता था कि सभी इंसान ह्वेनह्नम्स की तरह सच्चे, ईमानदार और दयालु बनें।
प्रेरणादायक पंक्ति: “इंसान बनना केवल दिखने में इंसान जैसा होना नहीं है। असली इंसानियत सच्चाई, करुणा और अच्छे आचरण में है। अगर कोई घोड़ा ईमानदार है, तो वह झूठे इंसान से बेहतर है।”
कहानी का सारांश
गुलिवर ने चार अलग-अलग दुनियाएँ देखीं। हर यात्रा ने उसे जीवन की कोई न कोई सीख दी:
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लिलिपुट – उसने सिखाया कि छोटे लोग भी बड़ा अहंकार रख सकते हैं। लिलिपुटियन शरीर से छोटे थे, लेकिन उनकी बुराइयाँ – ईर्ष्या, पाखंड, झूठ – बहुत बड़ी थीं।
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ब्रॉब्डिंगनेग – उसने सिखाया कि सच्ची महानता शरीर के आकार से नहीं, बल्कि मानसिक और नैतिक ऊँचाई से होती है।
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लपुटा – उसने सिखाया कि सिर्फ ज्ञान और विज्ञान काफी नहीं है। ज्ञान तब तक बेकार है, जब तक वह मानवता की सेवा में न लगाया जाए।
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ह्वेनह्नम्स – उसने सबसे बड़ी सीख दी कि इंसानियत शरीर से नहीं, आचरण से पहचानी जाती है। अगर हम झूठ, लालच और हिंसा में लिप्त रहेंगे, तो हम याहू से बेहतर नहीं होंगे।
हमारे लिए सीख
गुलिवर की कहानी सिर्फ एक रोमांचक यात्रा नहीं है, बल्कि एक गहरा व्यंग्य है। जोनाथन स्विफ्ट ने इस कहानी के माध्यम से इंग्लैंड की राजनीति और समाज की बुराइयों पर करारा प्रहार किया है। लेकिन आज भी यह कहानी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी तब थी।
यह कहानी हमें सिखाती है कि हमें अपने अंदर के लिलिपुटियन (छोटी सोच), ब्रॉब्डिंगनेगियन (बड़ा दिल), लपुटियन (बेकार ज्ञान) और याहू (पशुता) को पहचानना चाहिए। हमें ह्वेनह्नम्स की तरह सच्चा, ईमानदार और दयालु बनने का प्रयास करना चाहिए।
तो आइए, हम संकल्प लें कि हम न तो लिलिपुटियन की तरह छोटी सोच रखेंगे, न लपुटियन की तरह बेकार ज्ञान में उलझेंगे, न याहू की तरह जंगली बनेंगे। हम ब्रॉब्डिंगनेगियन की तरह बड़ा दिल और ह्वेनह्नम्स की तरह सच्चा आचरण रखेंगे।