विक्रम और बेताल: सच्चा पुरस्कार
एक अँधेरी और बरसाती रात थी। चारों ओर अजीब-अजीब आवाज़ें गूँज रही थीं और सियारों की कराहती हुई ध्वनि माहौल को और भयावह बना रही थी। वातावरण कितना भी भयावह क्यों न हो, राजा विक्रमादित्य तनिक भी नहीं डरे। वे पेड़ पर चढ़कर शव को उतार लाए और उसे कंधे पर रखकर जंगल की गहराइयों में आगे बढ़ने लगे।
रास्ते में बेताल बोला, “हे राजा, मुझे तुम्हारी दया आती है। तुम बिना विश्राम किए बार-बार मेरे पीछे आते हो, जैसे कोई महान लक्ष्य पाना चाहते हो। अपने महल में आरामदायक नींद का त्याग कर तुम यहाँ वर्षा और अँधेरे में मुझे पकड़ने चले आते हो।”
विक्रमादित्य मौन रहे क्योंकि वे जानते थे कि बोलते ही बेताल फिर पेड़ पर जा लटकता। इसलिए बेताल ने अपनी कथा आरम्भ की।
बहुत समय पहले कंचननगर नामक राज्य पर राजा चन्द्रदीप का शासन था। उनकी एकमात्र पुत्री थी — इन्दुमती। अकेली संतान होने के कारण उसे पुत्र की भाँति पाला गया था। उसे युद्धकला, अस्त्र-शस्त्र और वीरता का गहन प्रशिक्षण प्राप्त था। उसकी सुंदरता की ख्याति दूर-दराज के राज्यों तक पहुँच चुकी थी और कई राजकुमार उससे विवाह की इच्छा रखते थे।
जब भी राजा विवाह का प्रस्ताव रखते, इन्दुमती कहती, “हाँ पिता, परंतु जो भी मुझसे विवाह करना चाहे, उसे अपनी शक्ति और साहस सिद्ध करने होंगे। जो परीक्षाएँ मैं दूँगी, उन्हें पूरा करने वाला ही मेरा पति बन सकेगा।”
राजा यह सुनकर घबरा जाते। उन्होंने कहा, “इन परीक्षाओं पर ज़ोर मत दो। ये अत्यन्त जोखिमभरी हैं। कोई भी राजकुमार जान जोखिम में डालने नहीं आएगा।” लेकिन इन्दुमती अडिग रही। उसने कहा, “जो सच्चे मन से मुझसे प्रेम करते हैं, वे अवश्य अपना साहस दिखाएँगे।”
प्रधानमंत्री ने सुझाव दिया कि यदि राजकुमारी का यह आग्रह है तो उसकी इच्छा पूर्ण की जाए। इसलिए घोषणा कर दी गई कि जो भी राजकुमारी से विवाह करना चाहेगा, उसे कुछ कठिन परीक्षाओं से गुजरना होगा। यह सूचना चारों ओर फैला दी गई।
जयनगर में कुरूपशण नाम का एक युवा यह समाचार सुन रहा था। उसका जन्म से ही शरीर में दोष था। उसकी माता उसके जन्म के बाद ही चल बसी थी, और पिता ने दूसरी शादी कर ली थी। सौतेली माँ उसे कुरूपशण — अर्थात् कुरूप — कहकर पुकारती थी और हमेशा तिरस्कार करती रहती थी। उसे कभी पेट भर भोजन भी नसीब नहीं होता था। उसके मन में बचपन से ही यह भावना घर कर गई थी कि वह परिवार के लिए बोझ है।
जब उसने इन्दुमती की परीक्षा की घोषणा सुनी तो उसके मन में एक विचार कौंधा — यदि वह इस परीक्षा में सफल होता है तो कम से कम उसके गाँव-घर के लोग समझेंगे कि वह अयोग्य नहीं है। यदि वह असफल भी हुआ तो उसके लिए किसी को दुख नहीं होगा। इस विचार के साथ वह कंचननगर पहुँच गया।
परीक्षा के दिन अनेक राजकुमार मंच के सामने एकत्र थे। सभी आपस में चर्चा कर रहे थे कि राजकुमारी कौन-सी परीक्षा देगी। तभी इन्दुमती राजा के पास आकर बैठ गई और प्रधानमंत्री खड़े हुए। उन्होंने कहा, “राजकुमारी की इच्छा है कि जो भी उनसे विवाह करना चाहे, वह इस दीवार पर चढ़कर नीचे रखे तीन स्तर वाले तीक्ष्ण तलवारों के पिंजरे में कूदे। शर्त यह है कि उसके शरीर पर एक भी खरोंच नहीं आनी चाहिए।”
राजकुमारों ने दीवार और नीचे लगे खतरनाक ब्लेडों को देखा। दीवार ऊँची थी, पिंजरा गहरा था और तलवारों के बीच की जगह बहुत कम थी। कोई भी आगे आने का साहस न जुटा सका। सब अपनी-अपनी जगह लौटने लगे। राजा व्याकुल हो उठे कि काश इन्दुमती ने उनकी बात मान ली होती।
भीड़ में खड़ा कुरूपशण यह सब देख रहा था। अचानक उसने मन में ठान लिया कि उसे यह चुनौती स्वीकार करनी चाहिए। वह राजा के पास गया। राजा और इन्दुमती दोनों अचंभित रह गए। राजकुमारी को संदेह हुआ कि क्या यह युवा सफल हो पाएगा। परंतु उसने पिता की ओर देखा और राजा ने अनुमति दे दी।
कुरूपशण दीवार पर चढ़ा। उसने नीचे झाँककर तलवारों की दिशा और उनके बीच की सूक्ष्म दूरी को आँका, फिर एक गहरी साँस लेकर कूद पड़ा। आश्चर्य! वह पूरे पिंजरे में बिना एक भी खरोंच आए खड़ा रह गया। उपस्थित राजकुमार स्तब्ध रह गए।
कुरूपशण राजा और राजकुमारी की ओर बढ़ा और बोला, “महाराज, चिंता न करें। मेरा उद्देश्य राजकुमारी से विवाह करना नहीं था। मैं केवल यह सिद्ध करना चाहता था कि मैं निकम्मा नहीं हूँ। मेरे लिए यही सफलता जीवन का सबसे बड़ा पुरस्कार है।” इतना कहकर उसने झुककर प्रणाम किया और पीछे हट गया।
कहानी समाप्त कर बेताल ने प्रश्न किया, “हे राजन, क्या कुरूपशण मूर्ख था? यदि उसका विवाह करने का इरादा नहीं था तो फिर परीक्षा क्यों दी? और जब वह सफल हो गया तो उसने विवाह से इंकार क्यों किया?”
राजा विक्रमादित्य बोले, “नहीं, वह मूर्ख नहीं था। वह अत्यन्त समझदार था। वह जानता था कि उसकी विकलांगता के कारण उसकी सौतेली माँ उसे निरर्थक समझती है। वह चाहता था कि वह यह प्रमाणित कर सके कि जहाँ सक्षम लोग असफल हो गए, वह अपनी कमी के बावजूद सफल हुआ। यही उसके लिए सबसे बड़ा सम्मान था। जहाँ तक विवाह का प्रश्न है, वह समझता था कि यदि वह राजकुमारी से विवाह करेगा तो भविष्य में उसे राज्य चलाना होगा। किंतु अपने शारीरिक दोष के कारण न वह युद्ध कर सकेगा, न राज्य की रक्षा कर पाएगा। इसलिए उसने राजकुमारी का हाथ त्याग दिया। यही उसका विवेकपूर्ण निर्णय था।”
यह उत्तर सुनते ही बेताल ठहाका लगाकर फिर हवा में उड़ गया और वापस उसी प्राचीन वृक्ष पर जा लटका। विक्रमादित्य ने तलवार खींची और फिर उसके पीछे दौड़ पड़े।