विक्रम-और-बेताल-Vikram-and-Betal

विक्रम और बेताल: अंधविश्वास का भ्रम भाग चौदह

विक्रम और बेताल की कहानियाँ

विक्रम और बेताल: अंधविश्वास का भ्रम 

रात गहरी हो चुकी थी। आसमान बादलों से ढका था और हवा में ठंडक ऐसी थी कि जंगल की पत्तियाँ एक दूसरे से टकरा कर अजीब सी फुसफुसाहट पैदा कर रही थीं। उज्जैन के राजा विक्रमादित्य अपने वचन को निभाने के लिए श्मशान की ओर बढ़ते पड़ते थे और हर कदम के साथ उनके मन में केवल दृढ़ता की अग्नि जलती थी। रास्ते में कोई मनुष्य नहीं दिखता था, केवल दूर किसी जानवर की आवाजें आती थीं लेकिन विक्रम के चेहरे पर किसी तरह का भय नहीं था क्योंकि उन्हें अपने साहस पर पूरा भरोसा था। वह उस पुराने पेड़ के पास पहुँचे जहाँ बेताल उल्टा लटका हुआ उनकी प्रतीक्षा कर रहा था। विक्रम ने बिना शब्द बोले उसे पकड़ लिया और कंधे पर डालकर श्मशान से दूर चलने लगे। तभी बेताल ने अपनी तेज आवाज में कहा राजा तुमने मुझे फिर पकड़ लिया लेकिन क्या तुम मेरे प्रश्न से बच सकोगे यदि तुमने उत्तर दिया तो मैं छूट जाऊँगा और यदि चुप रहे तो तुम्हारा शरीर फट जाएगा। विक्रम बिना बोले आगे बढ़ते रहे और बेताल ने कहानी आरंभ कर दी।

बहुत समय पहले अवंति प्रदेश में एक गाँव था जिसका नाम अस्थलगढ़ था। गाँव छोटा था लेकिन लोग मेहनती और सरल थे। परंतु उस गाँव में एक भारी कमी थी। लोग हर घटना को देवी देवता का संकेत मानते और किसी भी बीमारी, दुर्घटना या परेशानी को दैवी दंड समझ लेते। गाँव में एक पुराना मंदिर था और उस मंदिर के पीछे एक कुटिया में कैलास नाम का पुरोहित रहता था। कैलास धार्मिक था परंतु वह लोगों के अंधविश्वासों का उपयोग करके स्वयं को अत्यंत प्रभावशाली मानने लगा था। वह अक्सर कहता यदि तुमने मेरी बात नहीं मानी तो तुम्हारे घर अनर्थ हो जाएगा। लोग उसे अपने दुख बताते और वह अनेक विचित्र उपाय बताता जिन्हें करने में लोग भय के कारण ही सही मान लेते।

इसी गाँव में एक किसान था हरिराम। उसका परिवार ईमानदार और शांत था। एक दिन जब बारिश कम पड़ने लगी, फसल सूखने लगी और पशुओं में कमजोरी आने लगी, तो गाँव के लोग भयभीत हो गए। उन्होंने कहा यह देवी का क्रोध है। हमें कैलास पुरोहित से प्रार्थना करनी चाहिए। कैलास ने यह सुनकर गाँव वालों को बुलाया और कहा इस बार देवी बहुत क्रोधित हैं। उन्हें मनाना आसान नहीं होगा। किसी एक परिवार को बलिदान देना होगा बलिदान से मेरा मतलब मनसा से है। कोई अपना प्रिय समान त्याग कर देवी को अर्पित करेगा तभी वर्षा होगी।

लोग डर गए। कोई आगे आने को तैयार नहीं हुआ क्योंकि वे समझ ही नहीं पा रहे थे कि ऐसा त्याग क्यों जरूरी है। तभी पुरोहित ने हरिराम की ओर देखा और कहा देवी ने संकेत दिया है कि तुम्हें अपना सबसे प्रिय वस्तु त्याग करनी होगी। हरिराम चौंक गया। उसके पास केवल दो चीजें थीं जिन्हें वह सबसे प्रिय मानता था उसकी पत्नी रमा और उसका दुधारू बैल। दोनों ही उसके जीवन के आधार थे। लेकिन गाँव के लोग कहने लगे अगर तुमने नहीं माना तो पूरे गाँव का अनर्थ होगा।

हरिराम ने डर और उलझन में पुरोहित की बात मान ली। पुरोहित ने कहा तुम्हें आज रात उस पुराने मंदिर के पीछे वाले जंगल में जाना होगा। वहाँ एक पत्थर का वेदी स्थान है। उस पर तुम जिसे प्रिय मानते हो उसे देवी को अर्पित करोगे और सुबह सूर्य निकलने पर वर्षा अवश्य होगी।

हरिराम पूरी रात बेचैन था। वह समझ नहीं पा रहा था कि देवी को क्यों किसी प्रिय वस्तु की आवश्यकता होगी। पर गाँव वाले उसके घर के बाहर इकट्ठा होकर बार बार कह रहे थे यह गाँव की भलाई के लिए है। अंततः वह भय में दबकर जंगल की ओर चल पड़ा। उसके पीछे उसकी पत्नी रमा भी चुपचाप चल रही थी। उसने कहा यह सब गलत लगता है लेकिन तुम अकेले मत जाओ। जंगल अंधेरा था और हरिराम वेदी के पास पहुँचा तो वहाँ घना सन्नाटा था। रमा ने धीमी आवाज में कहा क्या देवी सच में ऐसा त्याग चाहती हैं देवी तो ममता और दया की प्रतीक होती हैं। हरिराम को उसकी बात सही लगी लेकिन पुरोहित के शब्द उसके मन में घुम रहे थे।

उसी समय एक झाड़ी हिली और एक बूढ़ा साधु वहाँ प्रकट हुआ। उसकी आँखों में तेज था लेकिन शरीर कमजोर। उसने कहा बेटे तुम यहाँ क्यों आए हो। हरिराम ने पूरा किस्सा सुनाया। साधु गंभीर हो गया और बोला यह अंधविश्वास है। देवी कभी किसी प्रिय वस्तु के त्याग की मांग नहीं करतीं बल्कि मन की शुद्धता और भलाई चाहती हैं। पुरोहित ने गाँव पर नियंत्रण रखने के लिए झूठ फैलाया है। यह वेदी भी उसी ने बनवाई ताकि लोग डरें और उसकी बात मानें। रमा ने कहा हमें यह बात गाँव में बतानी चाहिए लेकिन गाँव वाले हम पर विश्वास नहीं करेंगे।

साधु बोला किसी को मनवाने का मार्ग डर नहीं सत्य होता है। यदि तुम साहस दिखाओगे तो लोग बुद्धि से सोचेंगे। साधु ने हरिराम को एक प्राचीन ग्रंथ दिखाया जिसमें लिखा था देवी पूजा में त्याग का अर्थ है बुराइयों को छोड़ना लालच को त्यागना क्रोध को जीतना न कि जीवित प्राणियों या प्रिय वस्तुओं को अर्पित करना। साधु ने कहा तुम यह ग्रंथ लेकर गाँव जाओ और सबको सत्य बताओ।

सूरज उगने लगा था। हरिराम और रमा साधु के साथ गाँव लौटे। लोग प्रार्थना कर रहे थे कि वर्षा हो जाए। हरिराम ने सबके सामने साधु की बात बताई और वह ग्रंथ सभी के सामने खोला। लोग अचंभित रह गए। तभी रमा बोली हमने वर्षों तक अंधविश्वास को सच मान लिया लेकिन आज समझ आया कि डर से किया गया काम पूजा नहीं होता।

गाँव वाले अब कैलास पुरोहित की ओर देखने लगे। पुरोहित ने खुद को बचाने की कोशिश की लेकिन सत्य के सामने उसके तर्क कमजोर पड़ गए। साधु ने कहा जब वर्षा ठहरती है तो यह प्रकृति का चक्र है देवी का क्रोध नहीं। आज बादल आने वाले हैं और तुम सभी को यह समझना होगा कि विश्वास और भ्रम में फर्क होता है।

कुछ समय बाद बादल घिरने लगे और वर्षा शुरू हो गई। लोग चौंक गए लेकिन इस बार उन्होंने समझा कि यह प्राकृतिक घटना है न कि किसी बलिदान का परिणाम। गाँव वालों ने कैलास को गाँव से निकाल दिया और अब लोग सोच समझकर निर्णय लेने लगे। हरिराम और रमा सबके प्रिय बन गए क्योंकि उन्होंने सत्य को सामने रखा और अंधविश्वास का भ्रम टूट गया।

बेताल ने कहानी समाप्त करते हुए कहा राजा अब बताओ कौन सबसे बुद्धिमान था। विक्रम ने उत्तर दिया साधु क्योंकि उसने भय नहीं सत्य का मार्ग दिखाया। बेताल हँसा और बोला उत्तर सही है और यह कहते ही वह विक्रम के कंधे से गायब होकर वापस पेड़ पर लटक गया। विक्रम ने फिर उसकी ओर कदम बढ़ाए क्योंकि वह जानते थे कि वचन सबसे बड़ा धर्म है और सत्य सबसे बड़ी शक्ति।

शिक्षा बिना समझे किसी बात पर विश्वास करना हमें गलत दिशा में ले जाता है और सही मार्ग हमेशा वही होता है जहाँ हम विवेक से सोचते और सत्य का पालन करते हैं।

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