राजकुमार और उसके असाधारण सेवक
एक समय की बात है, राजकुमार वीरेंद्र एक छोटे से राज्य का गरीब लेकिन दिल का धनी राजकुमार था। वह हमेशा से सपना देखता था कि उसे सच्चा प्रेम मिले, कोई ऐसा जो उसे उसके दिल की अच्छाई के लिए चाहे, न कि उसकी दौलत के लिए। एक दिन पड़ोस के राज्य में एक बेहद ख़ूबसूरत राजकुमारी, राजकुमारी सुहानी, की चर्चा उसने सुनी। उसके रूप, उसकी कोमलता और उसकी दयालुता का ज़िक्र सुनकर वीरेंद्र का मन उस पर आ गया। लेकिन एक बड़ी समस्या थी। राजकुमारी की माँ, रानी आसानी, बेहद ईर्ष्यालु और कठोर स्वभाव की थी। वह नहीं चाहती थी कि उसकी बेटी किसी से विवाह करे। इसलिए जब भी कोई वर राजकुमारी का हाथ मांगने आता, वह उसे कोई ऐसा काम देती जो करना लगभग असंभव होता, और जब वह असफल हो जाता, तो उसे मरवा देती। इस कारण लोग उस राज्य में विवाह प्रस्ताव लेकर जाना ही बंद कर चुके थे।
लेकिन राजकुमार वीरेंद्र सच्चा प्रेम पाने के लिए दृढ़ था। उसने तय किया कि वह सुहानी को जरूर पाएगा, चाहे रास्ता कितना भी कठिन क्यों न हो। अपनी यात्रा शुरू करने से पहले उसने सोचा कि वह अकेले यह युद्ध नहीं जीत सकता। उसे ऐसे साथियों की जरूरत होगी जिनमें असाधारण शक्तियाँ हों। कुछ ही दिनों में उसे पांच ऐसे अद्भुत इंसान मिल गए, जिनमें से हर एक अद्वितीय था।
पहला था मोटा भोलाराम, जिसे जितना खाना दो, वह सब खा सकता था, चाहे लोहे की जंजीरें हों, पत्थर हों या पूरा पहाड़ ही क्यों न हो। दूसरा था लंबू हाथीराम, जिसकी बाँहें इतनी लंबी थीं कि वह दूर खड़े पेड़ की चोटी से भी फल तोड़ सकता था। तीसरा था तेज़ नयनसुख, जिसकी आँखें इतनी तेज़ थीं कि वह मीलों दूर की घटनाएँ भी पल भर में देख लेता था। चौथा था बड़े कर्ण सिंह, जिनके कान इतने संवेदनशील थे कि वे जमीन के भीतर भी होने वाली हल्की हलचल सुन सकते थे। पाँचवाँ था शीतलदेव, जिसका शरीर इतना ठंडा था कि वह आग को भी छूकर बर्फ बना सकता था।
इन पाँचों ने वीरेंद्र से वादा किया कि वह चाहे जितनी भी कठिनाइयाँ सामने आएँ, वे उसके साथ खड़े रहेंगे। वे सभी मिलकर रानी आसानी के महल पहुंचे। रानी ने वीरेंद्र को देखकर मुस्कुराहट तो दिखाई, लेकिन उसके चेहरे पर छिपी हुई नफ़रत साफ झलक रही थी। उसने हमेशा की तरह असंभव कार्यों की सूची तैयार रखी थी।
पहला काम था राज्य के सबसे बड़े गड्ढे को उबलते तेल से भरकर उसमें से एक मोती निकालना। यह सुनते ही सभी डर गए, लेकिन शीतलदेव आगे बढ़ा। वह गड्ढे के पास गया और अपनी ठंडी साँस फूँकते ही उबलते तेल को ठोस बर्फ में बदल दिया। अब मोती निकालना किसी के लिए भी आसान था। रानी का पहला हथियार ध्वस्त हो चुका था।
दूसरा कार्य था जंगल में बंद एक चिड़िया को ढूँढकर लाना, जो अपनी गति से किसी को भी दिखाई नहीं देती थी। नयनसुख ने अपनी तेज़ नज़रों से जंगल के बीचों-बीच एक पेड़ पर उसे बैठा देखा। वहीं हाथीराम ने अपनी लंबी बाँहें फैलाकर बिना एक कदम चले उस चिड़िया को पकड़ लिया। रानी आसानी की भौंहें सिकुड़ने लगीं।
तीसरा काम था राजमहल के नीचे रखे एक विशाल लोहे के गोले को खाकर खत्म करना। यह किसी भी सामान्य व्यक्ति के लिए असंभव था, लेकिन भोलाराम तो इसका इंतजार ही कर रहा था। वह बैठा और कुछ ही मिनटों में पूरा गोला चबा गया। अब रानी की आँखों में गुस्से की आग दिखाई देने लगी।
चौथा कार्य था एक ऐसी आवाज़ का पता लगाना जो किसी को सुनाई नहीं देती थी। बड़े कर्ण सिंह ने कान बंद करके ध्यान लगाया और तुरंत बता दिया कि वह आवाज़ पड़ोस के गाँव में फंसी एक गाय की थी, जो कुएँ में गिर गई थी। यह सुनकर सब हैरान थे कि कोई इतनी दूर की आवाज़ कैसे सुन सकता है।
अब रानी आसानी असहाय महसूस कर रही थी, लेकिन फिर भी उसने आखिरी और सबसे कठिन काम दिया। उसने कहा कि राजकुमार सुहानी का हाथ तभी पा सकता है जब वह हवा में उड़ते रेशमी रुमाल को बिना दौड़कर पकड़ ले। यह सुनकर सब चौंक गए, लेकिन राजकुमार मुस्कुराया। उसने नयनसुख से पूछा कि हवा किस दिशा में रुमाल को ले जाएगी। फिर हाथीराम ने अपनी लंबी बाँहें वहाँ तक फैलीं। और पल भर में उसने रुमाल पकड़ लिया।
अब रानी के पास कहने को कुछ नहीं बचा था। उसका हर चाल, हर धोखा इन पाँचों ने मिलकर मात दे दी थी। हारकर वह महल छोड़कर चली गई, और फिर कभी वापस नहीं आई।
राजकुमारी सुहानी ने खुशी-खुशी वीरेंद्र का हाथ थाम लिया। उनके विवाह में पाँचों सेवक सम्मानित अतिथि बने। राज्य में खुशियाँ छा गईं और लोग कहते हैं कि जब दिल में सच्चाई और साथ में सही लोग हों, तो कोई भी कठिनाई बड़ी नहीं रहती। वीरेंद्र और सुहानी ने प्रेम, साहस और दोस्ती की यादों के साथ खुशहाल जीवन बिताया और उनकी कहानी पीढ़ियों तक सुनाई जाती रही।